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________________ (पूर्णांकों का) में हो सकते हैं। विस्तृत जानकारी ग.सा.सं. के अनुवादों और दत्त तथा सिंह द्वारा लिखित प्रसिद्ध हिन्दू गणित का इतिहास (भाग ||, पृ. 224 - 225) में उपलब्ध महावीर के व्यापक सूत्र से उपर्युक्त प्रश्न का जो उत्तर आता है, उसके अनुसार एक त्रिभुज की भुजायें होंगी 29, 29 तथा 40 (आधार या भूमि) और दूसरे की 37, 37 व 24 (प्रत्येक त्रिभुज का क्षेत्रफल = 420, तथा रज्जु = 98). नारायण की गणित कौमुदी में भी 'पैशाचिकम्" विभाग है। लेकिन महावीर का उपर्युक्त प्रश्न तथा उसके हल करने का सूत्र, केवल कुछ शब्दों की हेराफेरी के साथ गणित कौमुदी में भी पाया जाता है। नमूने के लिये नारायण का प्रश्न देखिये - द्विसमत्र्यसयो रज्जू समौ च गणिते समे तयोर्वद भुजादीनि गणितज्ञोऽसि चेत् सखे। 84॥ (गणित कौमुदी, IV, उदाहरण 84) मेलजोल स्पष्ट है। यहाँ तक कि नारायण ने महावीर के इस सन्दर्भ में प्रयुक्त 'रज्जु' शब्द को भी यहाँ अपना लिया। डॉ. परमानन्दसिंह के अनुसार उपर्युक्त प्रश्न महावीर ने ही प्रथम बार दिया था। (देखिये - गणित भारती, खंड 21, पृ. 53) महावीर के आठ सौ वर्ष बाद यूरोप में बहुत से गणितज्ञों ने भी उपर्युक्त पैशाचिक प्रश्न का विवेचन किया। इनमें फ्रांस के फान वान शूटेन कनिष्ठ (Frans van Schooten, 1657) तथा जे. एच. रान (J. H. Rahn, 1697) प्रमुख थे। (3) चापक्षेत्र गणित (Measurement of Circular Segment) PM चित्र 4 अर्द्धवृत्त की चाप खण्ड मान लो कि चित्र 4 में प्रदर्शित चाप क्षेत्र (bow-figure) यानी वृत्तीय चापखंड (Segment of a circle) में जीवा PQ, शर या इषु (arrow) MN, तथा वक्रीय चाप (arc) PNQ की लम्बाई क्रमश: C, h तथा s है। नारायण ने अपनी गणित कौमुदी (IV, 12) में अर्धवृत्त (semicircle) तक के चाप क्षेत्र के लिये निम्नलिखित व्यावहारिक सूत्र दिये हैं (देखिये गणित भारती, खंड 21, पृ. 14 - 15) :चाप, s = (2c + 2h)/2 = c + h ......................... (35) चापखंड का क्षेत्रफल, A = s.2h/4 .......................... (36) = (c + h)./2 ...... ......... (37) भारतीय गणित के ख्याति प्राप्त विद्वान, जापान के तकाओ हयाशी (Takao Hayashi) ने 1990 में प्रकाशित (गणित भारती, खंड 12 देखें) एक लेख में नारायण के सत्रों का विस्तृत विवेचन किया है। उनके अनुसार नारायण के सूत्रों का आधार वे सूत्र हैं जो महावीर ने आयतवृत्त (elongated circle) या दीर्घ वृत्त (ellipse) के लिये प्रयोग z +p 66 अर्हत् वचन, 14 (1), 2002 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.526553
Book TitleArhat Vachan 2002 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year2002
Total Pages108
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size7 MB
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