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________________ को ही स्वयं ना समझें। जन्म मृत्यु में 'ऐन्द्रीक अस्तित्व' को सर्वाधिक महत्ता देकर अनर्थ जीव हिंसा रोकी थी। हमारा स्वयं का भी जीवन बिना श्वांस, आहार, जल के नहीं ठहर सकता इसलिये शक्ति भर अपने पुरूषार्थ के भीतर एकेन्द्रिय जीवों की भी रक्षा रखनी चाही थी। उनका अध्ययन इतनी गहराइयों में उतरा था कि उन्होंने समूचे जीव जगत को उसके इंद्रिय - अस्तित्व पर सुख और दुख की अनुभूति लेने वाली 5 श्रेणियों में बांट दिया। 'एकेन्द्रिय' समस्त स्थावर (वायुकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, पृथ्वीकायिक, सूक्ष्म तथा बादर निगोद वनस्पति) जिनमें मात्र स्पर्श है तथा जिनमें रक्त तथा मांस की लघार नहीं है, इनके 199.5 लाख योनि स्थान बतलाये गये हैं। द्विडंद्रिय से लेकर पंचेन्द्रियों तक के त्रस / तिर्यंच बतलाये हैं जिनमें मांस की ही उपस्थिति है। "संज्ञी-असंज्ञी', मन सहित- मन रहित, मनुष्यों तथा शिशुवत वे जीव हैं। 'तत्वार्थ सूत्र' में श्रावक (श्रावकाचार) 10 तथा साधु (मूलाचार) 11 दोनों के जीवन संबंधी नियम बनाये थे। जैनाचार्यों ने वर्गणाओं की व्यवस्था को संज्ञी पंचेन्द्रिय मनुष्य की भाव - स्थिति देख इतनी सूक्ष्मता से दर्शाया है कि आज का मेडीकल जगत भी आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रहेगा। मनुष्य प्रकृति का सर्व सामर्थ्यवान जीव तो है ही प्रमादी भी वह कम नहीं है। पर्याय बुद्धि के वशीभूत उसे अपने पंचेन्द्रिय सुखों की ओर जाना, उनके लिये प्रयत्नशील होना. स्वाभाविक है। ऐसा करते हए दसरे सहजीवियों की उपेक्षा भी सहज संभव थी। किन्तु इस सबमें 'भावकर्म' और 'द्रव्य कर्म' कितना गहरे दलदल में उसे फेंक सकते हैं जहाँ कर्मफल झेलते उसकी यातनाएं, इसका भी चिन्तन सूक्ष्मता से करा दिया। पुण्यफल से प्राप्त यह पर्याय यदि भोगों ही में शेष कर दी तो पुण्य क्षीण होकर पापकर्मों का फल उसे एकेन्द्रिय जगत में ही चाहे-अनचाहे फेंकेगा और यात्रा का सम्पूर्ण संसार 84 लाख योनियों की भटकान लिये उसे मिल जायेगा। क्योंकि कर्मफल प्राप्ति में अब 'पापफल भी 'असाता वेदनीय' सबसे पहले सामने आकर खड़ा होगा - स्वागतार्थ! कदाचित वही समवेदना को सही-सही पहचानकर, सभी सहजीवियों के दुखों का भी ध्यान रखते हए अपना ध्यान रखता है तो वह 'सर्वकल्याण' करता है। वही धर्मी है, सम्यकदृष्टि है, सत्यार्थी है। जैन मान्यतानुसार कर्म (मन द्वारा) वचन किया हुआ वह बीज है जो मन द्वारा इच्छाओं का आधार ले आत्मा की चंचलता का कारण बना। (चित्र-11) बालों में फेरी प्य से उपजा विद्युतीय पाठपण MINS बालों में फेरी भी थी 57 663 कागज के टुकड़ों को खींचता वियुत प्रणवण चित्र क्रमांक 11 गई कंघी की तरह आत्मा पर हलचल के कारण 'चार्ज' (आकर्षण केन्द्रों) का निर्माण हो अर्हत् वचन, अक्टूबर 2000
SR No.526548
Book TitleArhat Vachan 2000 10
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year2000
Total Pages104
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size6 MB
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