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________________ मि. रसले कहते हैं कि मानभूमि के श्रावक यद्यपि वे अब हिन्दू हैं अपने प्राचीन काल में जैन होने की बात जानते हैं। मानभूमि और रांची में अब यह वर्णन प्रगट हुआ है कि वे अपने को अग्रवाल थे ऐसा कहते हैं, जो पार्श्वनाथ की भक्ति करते थे और सरयू नदी के तट के देश में रहते थे जो उस प्रान्त में गाजीपुर के पास गंगा में मिलती है। वहाँ वे व्यापार और सराफी का धंधा करते थे। वे कहते हैं कि मानभूमि से पहिले वे मान राजा के राज्य में बसे थे। उनकी जाति की किसी कन्या पर मान राजा ने झगड़ा किया इससे वे सब मिलकर पांचेत में बसे। राँची में ऐसा विश्वास किया जाता है कि पहले वे पुरी के पास उग्र में बसे जहाँ से वे छोटा नागपुर गये। बर्दमान और वीरभूमि में यह बात चलती है कि वे गुजरात से आये। वे अपने आप कहते हैं कि उनके बड़े लोग व्यापारी थे और पार्श्वनाथ की पूजा करते थे, परन्तु अब वीरभूमि, बाकुंडा और मानभूमि में वे अपने को हिन्दू कहते हैं। मानभूमि में उनका काम ब्राह्मण उस समय तक नहीं करते थे जब तक पांच के पूर्व राजा ने उन्हें एक पुजारी दे रखा था। इस पुजारी को राजा ने इस बात के इनाम में दिया था कि जब देश में मरहठों ने हमला किया तब एक श्रावक ने उस राजा को छिपाकर उसकी रक्षा की थी। मानभूमि में सराकों के 7 गोत्र हैं - आदिदेव, धर्मदेव, ऋषिदेव, सांडील्य, काश्यप, अनन्त और भारद्वाज। वीर भूमि में 'गौतम' और 'व्यास' दो गोत्र तथा रांची में 'वास्तव' और जोड़े जाते हैं। इनके चार थोक या पोट जाति स्थान की अपेक्षा से हैं। 1. पांच कोठिया - मानभूमि के पांचेत राज्य के निवासी 2. नदी पारिया - जो श्रावक मानभूमि में दामोदर नदी के दाहिने तट पर रहते हैं। 3. वीर भूमिय - वीरभूमि के रहने वाले 4. तमारिया - रांची के नातयार के निवासी इनकी पाँचवीं पोट जाति है जो व्यवसाय के आधार पर हैं जैसे सारकी तांती या तांती सराक जो बांकुरा के विष्णुपुर भाग में रहती है और बुनने का काम करती है और हलकी समझी जाती है। इसके भी चार भाग है - 1. आश्विनी तांती, 2. पात्रा, 3.उत्तर कुली और 4. मंदरानी। संथाल परगनों में जो जातियाँ है उनको - फूल सारकी, सिखरिया. कन्दल और सारकी तांती कहते हैं। इसके अलावा कुछ गोत्रों के नाम पशु रक्षा में अतिशय दया भाव प्रगट करते हैं। इससे इस बात का पता चलता है कि वे शाकाहारी मानभूमि जिले में सब जगह जैन मंदिर और मूर्तियाँ हैं। कर्नल डेल्टन ने मानभूमि का दौरा किया था। उससे मालूम हुआ कि मानभूमि में प्राचीन कारीगरी के बहुत चिन्ह अवशेष हैं जो सबसे प्राचीन हैं। वहाँ के लोग कहते हैं कि वास्तव में वे उन लोगों के वंशज हैं जिस जाति के लोगों को सिराक, सरावक कहते हैं जो यहाँ सबसे पहले बसने वाले थे।' सिंहभूमि जिला नागपुर के दक्षिण पूर्व में 1200 ई. के. ताम्र पत्र निकले है जिससे प्रगट है कि मयूरभंज के भोजवंश के राजाओं ने बहुत से ग्राम भेंट किये थे। इस वंश के संस्थापक वीरभद्र थे जो एक करोड़ साधुओं के गुरु थे। ये जैन थे। यहाँ ताँबे की खाने हैं व मकान हैं जिनका काम प्राचीन लोग करते थे। ये लोग श्रावक थे। यह देश श्रावकों का था। इन्होंने जंगलों में घुसकर ताँबे की खानें खोदी जिसमें अपनी शक्ति और अर्हत् वचन, अप्रैल 99 60
SR No.526542
Book TitleArhat Vachan 1999 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year1999
Total Pages92
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size23 MB
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