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________________ समवसरण का चित्र केवलज्ञान प्राप्ति के पश्चात भगवान ऋषभदेव का लोकोपकारी धर्मचक्र प्रवर्तन प्रारम्भ हुआ। एक सहस्र कम एक लाख वर्ष पूर्व वर्षों तक काशी, कुरु, कौशल, चेदि, अंग, बंग, मगध, आंध्र, कलिंग, पांचाल, अवंति, मालव, दशार्ण, विदर्भ आदि देशों में विहार करते षभदेव ने हिमालय की ओर प्रस्थान किया तथा अष्टापद के विशाला (बद्रीनाथ) आदि शिखरों पर तपश्चरण करते हुए आयु के चौदह दिवस शेष रहने पर वे कैलाश गिरि शिखर पहुँचे। कैलाश गिरि शिखर पर ध्यानस्थ हो, योग निरोधपूर्वक शेष अघातिया कर्मों का क्षय कर माघ कृष्ण चतुर्दशी के दिन प्रात: सूर्योदय बेला में ऋषभदेव ने मोक्ष प्राप्त किया। भगवान के साथ-साथ एक हजार मुनियों ने भी मुक्ति प्राप्त की। भगवान के निर्वाण के पश्चात वृषभसेन आदि गणधर, बाहुबली, भरत, तीर्थंकर अजितनाथ के पितामह महाराज त्रिदशंजय, व्याल, महाव्याल, अच्छेद, अभेद्य, नागकुमार आदि अनेक भव्य जीव भी अष्टापद के इन्हीं पावन गिरि शिखरों से मुक्त हुए। हिमगिरि - हिमालय को भरत क्षेत्र में एक विशेष गौरव प्राप्त है। विविध तीर्थ कल्प के अष्टापद गिरिकल्प में गौरीशंकर, द्रोणगिरि, नन्दादेवी, नर, नारायण, त्रिशुली, विशाला तथा कैलाश - इन सभी गिरि शिखरों को अष्टापद में गर्भित किया गया है। संस्कृत निर्वाण काण्ड के अनुसार - 'सहयाचले च हिमवति सुप्रतिष्ठे'4 - समस्त हिमालय ही सिद्धक्षेत्र है। हिमालय का प्राकृतिक वैभव, शांत एकांत विराट स्वरूप तथा तपोलीन मुनियों की भांति स्थिर खड़े ऊँचे-ऊँचे गिरि शिखर हृदय की आध्यात्मिक भावनाओं को उद्वेलित कर उसे आत्म चिंतन एवं आत्म साधना हेतु प्रेरित करते हैं। यही कारण है कि आत्म साधना हेतु सभी तीर्थंकरों एवं मुनिवरों ने सदैव इन्हीं गिरि शिखरों का आश्रय लिया है। पूर्व में स्थित सम्मेदशिखर से प्रारम्भ कर पश्चिम में गिरनार तक सभी गिरि शिखर इन महान आत्माओं की चरण रज से पावन हैं, निर्वाण प्राप्ति के साधन हैं। यदि कैलाश शिखर तीर्थंकर आदिनाथ का या गिरनार तीर्थंकर नेमिनाथ का मुक्ति धाम है तो सम्मेदशिखर को सर्वाधिक बीस तीर्थंकरों की निर्वाण भूमि होने का गौरव प्राप्त है। महाकवि कालिदास ने अर्हत् वचन, अप्रैल 99 53
SR No.526542
Book TitleArhat Vachan 1999 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year1999
Total Pages92
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size23 MB
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