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होने लगी। नृत्य चल रहा था किन्तु ऋषभदेव के मानस पटल पर भोगों का भव - रोगवर्द्धक स्वरूप चलचित्र की भांति स्पष्टत: परिलक्षित हो रहा था। वे देख रहे थे कि इस अमूल्य जीवन का एक वृहत् भाग तो मैंने सांसारिक भोगों के क्षणिक एवं नश्वर सुखों की लालसा में व्यर्थ ही गंवा दिया। अब आत्म कल्याण एवं सच्चे सुख की प्राप्ति का उपाय करना चाहिये। जीवन अनित्य है, मृत्यु निश्चित है, जीवन - मृत्यु का यह चक्र तो निरन्तर चलता ही रहेगा। कुछ ऐसा करना चाहिये जिससे इस भव चक्र से सदा के लिये मुक्ति प्राप्त की जा सके। यह मानव जीवन पुन: धारण न करना पड़े।
. विचारों में सांसारिक भोगोपभोगों के प्रति तीव्र विरक्ति उत्पन्न होते ही लौकांतिक देवों ने वहाँ आकर श्री ऋषभदेव के आत्म कल्याणकारी विचारों की अनुमोदना की तथा निवेदन किया - 'हे देव! आप तो धर्मतीर्थ के प्रवर्तक हैं, अत: कर्म शत्रुओं का क्षय कर श्रेष्ठ मोक्षमार्ग प्रकाशित करे। श्री ऋषभदेव ने आत्म कल्याण के पथ पर अग्रसर होने का दृढ़ निश्चय कर समस्त राज्य का अपने पुत्रों में बंटवारा कर दिया। भरत को अयोध्या, बाहुबली को पोदनपुर तथा शेष 99 पुत्रों को विभिन्न राज्यों का स्वामित्व प्राप्त हआ। अब सर्व प्रकार निराभार हो उन्होंने तपश्चरण हेतु वनागमन का निश्चय किया। अत: सुदर्शना नामक पालकी पर आरूढ़ हो, नगर के बाह्य भाग में स्थित सिद्धार्थक वन की ओर उन्होंने प्रस्थान किया। उस समय भगवान का तपकल्याणक उत्सव देखने के लिये महाराज नाभिराय, माता मरुदेवी, हजारों राजा तथा समस्त पुरवासी पालकी के पीछे-पीछे चल रहे थे। वन में पहुँच श्री ऋषभदेव ने माता - पिता तथा समस्त परिवारजनों से अनुमति ली एवं वस्त्राभूषण आदि समस्त बाह्य परिग्रह का परित्याग कर पूर्ण दिगम्बर हो, पंचमुष्टि केशलंचुन कर, ॐ नम: सिद्धेभ्य: उच्चारण करते हुए सिद्धों की वन्दना की तथा वट वृक्ष के नीचे एक शिला पर बैठ ध्यानस्थ हो गये। जिस स्थान पर श्री ऋषभदेव ने दीक्षा ली थी वही स्थल बाद में प्रयाग, वर्तमान में इलाहाबाद नाम से प्रसिद्ध हुआ।
अट्ठाइस मूलगुणों का सम्यक पालन करते हुए मुनि ऋषभदेव ने छह माह तक निराहार रहकर अनशन तप की आराधना की। बाद में विहार करते हए वे हस्तिनाप जहाँ बाहुबली के पुत्र सोमप्रभ राज करते थे। सोमप्रभ के पुत्र श्रेयांसकुमार द्वारा इक्षुरस के रूप में दिये गये आहार से महामुनि ने पारणा की। यह पावन दिवस लोक में आज भी अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाता है।
एक हजार वर्षों की मौन साधना के पश्चात उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति हुई एवं मनि श्री ऋषभदेव शुद्ध, बुद्ध, पूर्ण वीतरागी, अर्हत् परमेष्ठी पर उनका समवशरण आयोजित हुआ। भूमि से चार अंगुल ऊपर कमलासन पर भगवान विराजमान हुए। भगवान ऋषभनाथ की वाणी मुखरित हुई। वृषभसेन उनके प्रमुख प्रस्तोता - गणधर बने। वहाँ उपस्थित सभी भव्य जीवों ने उनका आत्म हितकारी एवं मुक्ति पथ प्रदर्शक दिव्य उपदेश ग्रहण किया। भगवान की कल्याणमयी अमृत वाणी श्रवण करने महाराज भरत भी सपरिवार पधारे। स्वसमय एवं परसमय रूप अनादि तत्व का निरूपण करते हुए भगवान ने कहा 'जो समय बीत गया वह लौटकर नहीं आता। मोह - माया में लिप्त जीव सम्यक पुरुषार्थ द्वारा ही मुक्ति प्राप्त कर सकता है। अत: सभी सम्यक पुरुषार्थ करते हुए, कषायों से विरत हो इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करें।
अर्हत् वचन, अप्रैल 99