SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 53
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ वर्ष - 11, अंक - 2, अप्रैल 99, 51 - 57 अहत् वचन । तीर्थंकर ऋषभदेव (आदिनाथ) और उनकी साधना स्थली कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर) विशाला (बद्रीनाथ) - गुलाबचन्द जैन * ___ कालचक्र के तृतीय खण्ड सुषमा - दुषमा की समाप्ति के चौरासी लाख वर्ष पूर्व (जिनागम में 'पूर्व' का परिणाम 70 लाख 56 हजार कोटि वर्ष निर्धारित है) के साढ़े आठ माह शेष रहने पर विनीता नगरी (वर्तमान अयोध्या) के शासक, अन्तिम कुलकर, इक्ष्वाकुवंशी महाराज नाभिराय के यहाँ उत्तराषाढ़ नक्षत्र की चैत्र कृष्ण नवमी की प्रभात वेला में जैन धर्म के आदि प्रवर्तक, प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव का जन्म हुआ था। महारानी मरुदेवी उनकी जननी थीं। श्री ऋषभदेव जन्म से ही अप्रतिम बौद्धिक शक्ति एवं प्रतिभा सम्पन्न थे। बीस लाख वर्ष पूर्व की आयु में इनका विवाह कच्छ एवं सुकच्छ देश की दो सुलक्षणा, सुन्दर कन्याओं नंदा (यशस्वती) व सुनंदा से हुआ था।' श्री ऋषभदेव की प्रथम पत्नी नंदा से भरत आदि 99 पुत्र तथा एक पुत्री ब्राह्मी और दूसरी पत्नी सुनन्दा से एक पुत्र बाहुबली तथा एक पुत्री सुन्दरी का जन्म हुआ था। श्री ऋषभदेव के वयस्क हो जाने पर उन्हें सम्पूर्ण राज्य भार सौपकर महाराजा नाभिराय आत्म चिंतन एवं धर्माराधन पूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे। श्री ऋषभदेव के पूर्व यह क्षेत्र भोगभूमि था। जनता को जीवनोपयोगी सभी पदार्थ बिना कोई श्रम किये, कल्पवृक्षों द्वारा सहज ही प्राप्त हो जाते थे। किन्तु काल के प्रभाव से क्रमश: कम होते हुए कल्पवृक्षों का अभाव हो गया। अब सभी के समक्ष जीवनोपयोगी वस्तुओं की प्राप्ति का प्रश्न उपस्थित था। महाराज ऋषभदेव ने जनता के कष्टों का अनुभव करते हुए उन्हें श्रमपूर्वक कृषि कर्म, कृषि हेतु आवश्यक वस्तुओं के निर्माण, पशु पालन, जिससे दूध, घी आदि खाद्य के साथ - साथ कृषि हेतु उपयोगी पशु - वृषभ प्राप्त हो सके, वस्त्र निर्माण तथा वाणिज्य - व्यवसाय आदि की शिक्षा दी ताकि सभी श्रमपूर्वक सुखी जीवन निर्वाह कर सकें। इस प्रकार भोगभूमि समाप्त होकर कर्म भूमि का प्रारम्भ हुआ। नागरिकों के साथ - साथ उन्होंने अपने पुत्रों को भी विभिन्न विद्याओं - मल्ल विद्या, अस्त्र-शस्त्र चालन, गायन - वादन, शिल्प एवं चिकित्सा आदि में निपुणता प्रदान की। उन्होंने अपनी पुत्री ब्राह्मी और सुन्दरी को भी अक्षर एवं अंक विद्या की शिक्षा दी। पुत्री ब्राह्मी के नाम पर ही ब्राह्मी लिपि का आविष्कार हुआ जिसे बाद में संस्कृत आदि भाषाओं की जननी होने का गौरव प्राप्त हुआ। अत: सभी प्रकार से संतुष्ट एवं सुखी नागरिकों के साथ महाराज ऋषभदेव निर्विघ्न एवं सानंद राज्य करने लगे। एक दिन राज दरबार में राजनर्तकी नीलांजना का नृत्य चल रहा था। नृत्यावस्था में ही अकस्मात आयु समाप्त हो जाने कारण नर्तकी की मृत्यु हो गई। वहाँ उपस्थित इन्द्र ने चतुरतापूर्वक स्थिति को संभालते हुए तत्काल ही नीलांजना के स्थान पर किसी अन्य नर्तकी को स्थापित कर दिया। नृत्य चलता रहा किन्तु नर्तकी बदल गई। सभासदों को इस दुर्घटना एवं परिवर्तन की भनक भी न पड़ी किन्तु अवधिज्ञानी ऋषभदेव से यह घटना छिपी न रह सकी। इस घटना का उनके मन पर गंभीर प्रभाव पड़ा तथा जीवन की नश्वरता का बोध होकर उनके मन में वैराग्य की अजस्र धारा प्रवाहित * राजकमल स्टोर्स, सावरकर पथ, विदिशा-464001
SR No.526542
Book TitleArhat Vachan 1999 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year1999
Total Pages92
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size23 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy