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अपने प्रसिद्ध काव्य ग्रन्थ 'कुमारसंभव' में 'आस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराज: लिखकर पर्वतश्रेष्ठ हिमालय को देवताओं की आत्मा निरूपित किया है।
मरुदेव्यासहनाभिः राजोराजातैर्वत:,
अनुस्तिस्थौ तदादृष्टुम् विभोर्निष्क्रमणोत्सवम्॥ अर्थात् भगवान का दीक्षा कल्याणक महोत्सव देखने के लिये महारानी मरुदेवी सहित महाराज नाभिराय सैकड़ों राजाओं और पुरजनों के साथ ऋषभदेव की पालकी के पीछे-पीछे चल रहे थे। इसके पश्चात श्री नाभिराय के जीवन के उत्तरार्द्ध, वे कब तक जीवित रहे? तथा अपना शेष जीवन उन्होंने कहाँ व किस प्रकार व्यतीत किया? इन बातों की चर्चा शास्त्रों में कहीं भी देखने को नहीं मिलती। किन्तु हिन्दू धर्मग्रंथ श्रीमद्भागवत में महर्षि शुकदेव द्वारा प्रस्तुत विवरण से नाभिराय के संबंध में कुछ जानकारी अवश्य प्राप्त होती है। उनके अनुसार - "विदिताधर्मानुरागमापौरप्रकृति जनपदी राजानाभिरात्यजम् समय सेतुरक्षायामाभिषिच्य सहमरूदेव्या विशालायाम् प्रसन्नचित्तेननिपुणेन तपसा समाधियोगेन् ......महिमानवाप्त।"
उपरोक्त कथन की टीका करते हुए श्रीधरस्वामी लिखते हैं - 'पुरवासियों की प्रकृति को अभिव्याप्त करने वाला जिनका अनुराग प्रसिद्ध था तथा जो जन-जन के परम आदरणीय एवं श्रद्धा के पात्र थे, ऐसे महाराज नाभिराय ने धर्म मर्यादा की रक्षा के लिये अपने पुत्र ऋषभदेव का राज्याभिषेक कर स्वयं विशाला बदरिकाश्रम में प्रसन्न मन से परम आदरणीय उत्कृष्ट तप तपते हुए यथाकाल महिमापूर्ण जीवन मुक्ति निर्वाण प्राप्त किया।' श्रीमद्भागवत के उक्त कथन से यह स्पष्ट हो जाता है कि महाराज नाभिराय ने अपने जीवन के अंतिम समय में विशाला बद्रीनाथ गिरि शिखर पर तपश्चरण करते हुए यहीं से मुक्ति प्राप्त की थी।
पर्वतीय अंचल प्रारम्भिक अवस्था में हरे - भरे, विशाल एवं सघन वृक्षों से आच्छादित रहते हैं किन्तु जैसे जैसे ऊँचाई बढ़ती जाती है, ऊँचे घने वृक्ष विरल होते जाते हैं तथा उनका स्थान छोटी-छोटी झाड़ियाँ लेने लगती हैं। समुद्रतल से दस ग्यारह हजार फुट ऊँचे बद्रीनाथ शिखर की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। यहाँ सर्वत्र बदरी - बेर की छोटी छोटी झाड़ियाँ ही दिखाई देती हैं। यहाँ का स्वच्छ, सुरम्य एवं शांत वातावरण तपस्या एवं आत्म साधना हेतु अनुकूल, एक आश्रमवत प्रतीत होता है। तथा यही परिदृश्य इस गिरि शिखर के बदरिकाश्रम बद्रीनाथ नाम को सार्थकता प्रदान करता है।
बद्रीनाथ मन्दिर के पीछे कुछ दूरी पर नर, नारायण एवं नीलकंठ गिरि श्रृंगों के मध्य एक विशाल प्रस्तर शिला पर चरणों की अनुकृति उत्कीर्णित है। स्थानीय जनता इसे धर्मशिला कहकर आदर प्रदान कर रही है। महाराज नाभिराय की तप एवं निर्वाण भूमि होने के कारण विशाला - बद्रीनाथ शिखर पर निर्मित यह चरण नि:सन्देह नाभिराय के ही चरण हैं। महामानवों के निर्वाण के पश्चात उनके चरण निर्माण करने का प्रचलन जैन समाज में विशेष रूप में अति प्राचीन काल से ही प्रचलित है। तीर्थंकरों एवं महामुनियों की निर्वाणभूमि पर उनकी प्रतिमा स्थापित न कर उनके चरण ही प्रतिष्ठित किये जाते रहे हैं। श्री सम्मेदशिखर एवं गिरनार आदि शिखरों पर भी वहाँ से मुक्त हुए भगवंतों के चरण ही विराजमान हैं। साथ ही कैलाश गिरि की ओर विहार करते समय मुनि ऋषभदेव द्वारा यहाँ किया गया
अर्हत् वचन, अप्रैल 99