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एवं रानी महल में हैं। संग्रहालय में संग्रहीत जैन प्रतिमाओं का वर्णन - (1) ऋषभनाथ -
प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ की स्थानक प्रतिमा का सुन्दर अंकन है जिनके वक्ष पर स्वास्तिक का अंकन है। इस प्रतिमा की विशिष्टता दर्पण जैसी चमक आज भी विद्यमान होना है। प्रभामण्डल सादा है जिसके दोनों और दो विद्याधर चंवर लिए हुए हैं। गजाभिषेक का अंकन भी दिखाया गया है। निचले हिस्से में दोनों ओर चंवर धारी तथा सेविकाएं बैठी हाथ जोड़े पूजित भाव में दिखाई गयी हैं। प्रतिमा की चरण चौकी के नीचे अभिलेख भी लिखा है जो कि निर्माण की तिथि संवत् 1248, वैशाख सुदी 2 स्पष्ट है। लेख इस प्रकार है -
(क) संवत् 1248 वैशाख सुदि 2 वुदे.......सा (ख) बुऊल्हा तस्यं मार्या प्रनतासुत सावु....... (ग) सुत.......नित्यं प्रणमति
12 वीं शती की प्रतिमा चरखारी जिला हमीरपुर से प्राप्त हुई है। (देखें चित्र - 1) (2) ऋषभनाथ आसनस्थ प्रतिमा -
12 वीं शती की यह प्रतिमा महोबा, जिला हमीरपुर से प्राप्त हुई है। ऋषभनाथ पद्मासन में ध्यान मुद्रा में बैठे हैं। इनके बाल और कंधे के जोड़ स्पष्ट दिखते हैं। प्रतिमा में कान लम्बे हैं। वक्ष पर श्रीवत्स अंकित है, हथेली और बाजु में कमल चिन्ह का भी अंकन किया गया है। विराजित चौकी पर सुन्दर बेल लताओं का भी अंकन दृष्टिगोचर होता है। (3) ऋषभनाथ पद्मासन प्रतिमा -
ऋषभनाथ पद्मासन मुद्रा में ध्यानस्थ अवस्था में', आँखें ध्यान मुद्रा में, कान लम्बवत्, सिर के बाल बंधे हुए धुंघराले हैं। प्रतीक लांछन 'बैल' उनके आधार के मध्य भाग में चिन्हित है। प्रतिमा पर चमकदार पालिश आज भी मौजद है। प्रतिमा की चरण चौकी के नीचे अभिलेख का अंकन है, जो निम्न है -
'ना वरान्वयैसावुजीज तस्य सुत सैष्ठिघाटु तस्य सुतसवै
सुल्हा नित्यं सजणि प्रणमति। 1228 येष्ठ सुदिं अनुवाद - सवै सुल्हा जो कि पुत्र है ....... निरन्तर वंदना करता है। प्रथमा शुक्ल पक्ष 1228-1
यह प्रतिमा महोबा से 12 वीं शती के लगभग की प्राप्त हुई है। (4) चक्रेश्वरी :
द्वार स्तम्भ पर व्यापक रूप से खुर्द दण्ड के दाहिने में प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ की यक्षी चक्रेश्वरी बाहर निकले हुए गरूड़ पर विराजमान है। उनका एक पैर नीचे की ओर है जो गरूड़ की हथेली पर रखा है। चक्रेश्वरी दसभुजी प्रदर्शित हैं।
उनके दाहिने हाथ में तलवार दूसरे में ढाल है। एक हाथ वरद मुद्रा में। बाएं हाथों में क्रमश: कमलनाल, तीर, चक्र लिए दिखाया गया है। चक्रेश्वरी शंक आकार मुकुट, मैखला, पायल, हार, आदि आभूषणों से सुशोभित हैं। प्रभामण्डल सादा है। विद्याधर हार 46
अर्हत् वचन, अप्रैल 99