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________________ 12. तोशाम - यह छोटा सा कस्बा हिसार के पास है। यहाँ 9 - 10वीं सदी की जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं प्राप्त हुई थीं। 13. कांगड़ा - यह प्राचीन जैन तीर्थ है, जिसका विवरण "विज्ञप्ति त्रिवेणी' ग्रन्थ में विस्तृत रूप से आया है। आज भी कांगड़ा के भव्य किले में भगवान ऋषभदेव की प्राचीन प्रतिमा स्थापित है। पास ही अम्बिका देवी का मंदिर है। ऐसा माना जाता है कि पहले यहां भगवान नेमिनाथ की प्रतिमा थी, जिसके स्थान पर इस प्रतिमा को स्थापित किया गया। इस किले में और भी अनेकों मंदिरों के खण्डहर हैं, जिस पर शोध की आवश्यकता है। इस तीर्थ की खोज का सौभाग्य पंजाब केसरी श्वे. जैन आचार्य श्री विजयवल्लभजी महाराज को है। इस तीर्थ का उद्धार महतरा मृगावती श्री जी ने किया था। कांगड़ा के इन्द्रेश्वर मंदिर में डा. वुल्हर ने भगवान ऋषभदेव की खण्डित प्रतिमा के पत्थर पर एक शिलालेख पढ़ा था। इसी तरह वैजनाथ पपरोला में भी एक प्रतिमा लेख का उल्लेख उन्होंने किया है। इसी के पास ज्वाला जी मंदिर में आज भी एक स्थान पर सिद्धचक्र का गट्टा पड़ा है। आज से 100 वर्ष पूर्व वहां शिलालेख था, जिसे इसी विद्वान ने पढ़ा था। यहीं लुंकड़ यक्ष की पूजा होती है।' ज्वालादेवी शासनदेवी रही हैं, हो सकता है, मूलनायक की प्रतिमा वहां रही हो। पर आजकल वहां कोई जिनप्रतिमा नहीं है। इस मंदिर का उल्लेख विज्ञप्ति त्रिवेणी में भी आया है। 14. हस्तिनापुर - तीन तीर्थंकरों के 12 कल्याणकों की यह पवित्रस्थली है। इसे कौरवों की राजधानी होने का सौभाग्य प्राप्त रहा है। गंगा के किनारे होने से इसे बहुत विनाश झेलना पड़ा है। इसका प्रमाण विस्तृत टीले हैं और उन टीलों पर शेष है - पुरातत्व के चिन्ह। भगवान ऋषभदेव के पारणास्थल के करीबी टीले पर दिगम्बर सम्प्रदाय द्वारा मान्य तीनों तीर्थंकरों की चरण पादुकायें स्थापित हैं। इनके अतिरिक्त गंगा नहर की खुदाई से 7-8 वीं सदी के तीर्थंकरों की तीन प्रतिमाएं मिली हैं, जो यहां के 200 वर्ष प्राचीन दिगम्बर जैन मंदिर में विराजमान हैं। इसी मंदिर में भगवान शान्तिनाथ जी की विशाल खड़ी खड़गासन प्रतिमा पारणा स्थल से प्राप्त हुई थी। इस पर एक लेख भी है। यह प्रतिमा 12 वीं सदी की है। हस्तिनापुर में वर्षांतप का पारणा होता है। दोनों सम्प्रदायों के विस्तृत व भव्य मंदिर यहां बने हैं। पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से बना जम्बूद्वीप यहां का भव्य दर्शनीय स्थल है। इसी जम्बूद्वीप परिसर में श्वेत कमल में भगवान महावीर का मन्दिर एवं जम्बूद्वीप पुस्तकालय स्थित है। स्वयं आचार्य जिनप्रभवसूरि ने विविध तीर्थकल्प में इस क्षेत्र के मंदिरों का उल्लेख किया है पर वह मंदिर आज प्राप्त नहीं है। प्रसिद्ध जैन विद्वान एवं समयसार नाटक के रचियता पं. बनारसीदास ने यहां यात्रा की थी, तब भी यहाँ प्राचीन मंदिर विद्यमान थे। 15. कटासराज - यह क्षेत्र पाकिस्तान के झेलम जिले में पड़ता है। यह पहाड़ी क्षेत्र हिन्दुओं का धर्म स्थान है। कहा जाता है कि इस स्थल पर युधिष्ठर ने यक्ष के प्रश्नों के उत्तर दिए थे। इन्हीं पहाड़ियों में अनेकों स्थलों पर जिन प्रतिमाएं उत्कीर्ण हैं जो किसी जैन मंदिर के अवशेष हैं, ऐसा उल्लेख 'मध्य एशिया व पंजाब में जैन धर्म' नामक ग्रन्थ में पं. हीरालालजी दुग्गड़ ने किया है। इसका प्राचीन नाम सपादलक्ष पर्वत माना जाता है। अर्हत् वचन, अप्रैल 99
SR No.526542
Book TitleArhat Vachan 1999 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year1999
Total Pages92
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size23 MB
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