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इसमें आचार्य श्री जिनभद्रजी, उनके शिष्यों श्री जयसागर, मेघराज गणि, सत्यरूचि, मतिशील व हेमकुंवरजी की कांगड़ा तीर्थ की यात्रा का वर्णन है। इस वर्णन के साथ-साथ तत्कालिक पंजाब की भौगोलिक स्थिति व पंजाब में जैन मंदिरों की स्थिति का सुन्दर वर्णन है। वि.सं. 1484 में यह यात्रा सम्पन्न हुई थी। उस समय कांगडा का राजा कटोज वंशज नरेशचन्द जैन धर्म का प्रमुख श्रावक था। आचार्य श्री सिन्ध (वर्तमान पाकिस्तान) के क्षेत्रों से विचरण करते हुए कांगडा क्षेत्र में पहुंचे थे। रास्ते में उन्हें व्यास नदी के पास फरीदपुर (पाकपटन) तलपटन (तलवाड़ा), देवालपुर, कंगनपुर (पाकिस्तान) हरियाणा (होशियारपुर जिला) नगर आए थे। वापिसी में वह गोपाचलपुर (गुलेर हिमाचल), नन्दपुर (नादौन) कोटिल ग्राम (कोटला) होते हुए लम्बा समय धर्म प्रचार करते रहे। - वि.सं. 1345 में श्रावक हरीचंद ने कांगड़ा तीर्थ के दर्शन किये। इस के अतिरिक्त वि.सं. 1400, 1422, 1440, 1497, 1700 तक कांगड़ा तीर्थ पर किले में स्थित भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा के दर्शन करने वालों का उल्लेख मिलता है।
इन्हीं संदर्भो में हम प्राचीन पंजाब के पुरातत्व स्थलों का अध्ययन करेंगे। इन स्थलों में कुछ प्रमुख स्थलों का वर्णन इस प्रकार है। 1. हड़प्पा -
सिन्धु घाटी का प्रमुख केन्द्र हड़प्पा पंजाब के पाकिस्तानी भाग में पड़ता है। यहां से प्राप्त कुछ मोहरें कायोत्सर्ग मुद्रा में प्राप्त होती है। इस सभ्यता का समय ई. पू. 7000 से 5000 ई.पू. वर्ष आंका गया है, जो भगवान पार्श्वनाथ से पहले का है। इतनी बड़ी सभ्यता में किसी भी वैदिक क्रियाकाण्ड से जुड़े धार्मिक स्थल या यज्ञशाला का प्रमाण उपलब्ध नहीं होता। वस्तुत: यह सभ्यता यहां के मूल द्राविड़ लोगों की सभ्यता थी, जो श्रमण संस्कृति के उपासक थे। यहां से प्राप्त नग्न दिगम्बर प्रतिमा की तुलना लोहानीपुर (पटना) से प्राप्त मौर्यकालीन प्रतिमा से की जा सकती है। दोनों प्रतिमाओं के आकार में अंतर जरूर है। दिगम्बर जैनाचार्य श्री विद्यानन्द जी महाराज ने बहुत सी मुद्राओं का अध्ययन कर यह सिद्ध किया है कि कई मुद्राएं भरत-बाहुबली से सम्बन्धित हैं। अनेक वरिष्ठ पुराविद् भी इसी मत के हैं। मोहनजोदड़ों से प्राप्त ध्यानस्थ योगी की प्रतिमा का सम्बन्ध विशद्ध रूप से श्रमण परम्परा से है। वैदिक धर्म में ध्यान की परम्परा बाद की
2. कासन -
हरियाणा के गुड़गांव जिले में पिछले दिनों एक प्राचीन जैन मंदिर के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इस मंदिर के 3 शिखर हैं। बीच में 16 आले हैं, जो संभवत: 16 विद्यादेवियों के स्थान रहे होंगे। यहाँ प्रतिमाएं धातु की हैं, सभी प्रतिमाओं की आयु 1400 वर्ष से 400 वर्ष तक आंकी गई है। मूल प्रतिमा में भगवान पार्श्वनाथ और भगवान महावीर स्वामी की प्रतिमा बहुत ही आकर्षक है। इस मंदिर को अब दिगम्बर जैन अतिशय तीर्थ का रूप दिया गया है। 3. पिंजौर -
पिंजौर ग्राम हरियाणा के कालका जिले में पड़ता है। अपने मुगल गार्डन के लिए प्रसिद्ध इस स्थल से कुछ दूर बहुत सी विशाल जैन प्रतिमाएं निकली थीं, जो भूरे रंग की हैं। इसका समय 8 वीं सदी जान पड़ता है। प्राचीन साहित्य में इस गांव का नाम पंचपूर था। यह जैन कला का अच्छा केन्द्र रहा है। यहां से प्राप्त प्रतिमा कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय में देखी जा सकती हैं। इन में ज्यादा ऋषभदेव, पार्श्वनाथ व महावीर की हैं।
अर्हत् वचन, अप्रैल 99