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विश्व में किया। उस काल के मंदिर व प्रतिमाऐं गुजरात, राजस्थान आदि प्रान्तों के प्राचीन मंदिरों आदि में दृष्टिगोचर होतीं हैं।
इसी बीच कलिंग सम्राट खारवेल ने 161 ई. पू. में जैन धर्म को राज्य धर्म घोषित किया। उसके खण्डगिरि के शिलालेख में उत्तरापथ के राज्य को विजित करने का उल्लेख है। यह राजा 15 वर्ष की अल्पायु में सिंहासन पर बैठा। इसने खण्डगिरि व उदयगिरि में जैन मुनियों के लिए गुफाऐं निर्मित की। कश्मीर के प्रसिद्ध इतिहासकार कल्हण ने महामेघवाहन भिक्षराज खारवेल द्वारा कश्मीर व गंधार देश विजयकर पशुबलि बंद करने एवं मंदिर निर्माण का उल्लेख है। राष्ट्रसंत आचार्य श्री विद्यानन्दजी ने इस क्षेत्र में विपुल शोध कार्य कराया है। श्वे. परम्परा के आचार्य श्री विमल मुनि जी का कथन है कि 'आज भी इस राजा के वंशज मेधा कहलाते हैं।'
कल्हण के एक उल्लेख में अशोक को श्रीनगर का निर्माता व जैन धर्म का परम श्रावक माना गया है।
इसके बाद जैन धर्म को राजनैतिक आश्रय मिलना बंद हो गया। जैन धर्म का उत्तर भारत से पलायन होना मौर्य काल में शुरु हो गया था। गुप्त काल में जैन धर्म की अच्छी स्थिति का वर्णन हिन्दू पुराणों में उपलब्ध है।' जैन धर्म को गुप्त काल के बाद नुकसान पर नुकसान उठाना पड़ा। वर्तमान पंजाब में जैन धर्म
जैन धर्म हर युग में किसी न तो यह धर्म अपने परमोत्कृष्ट पर था। से मानती हैं। 1. ओसवाल 2. अग्रवाल । है। यह लोग राजस्थान से सिंध, पंजाब, गंधार तक फैले जिन्हें स्थानीय भाषा में भावड़ा भी कहा जाता है। यह अधिकांश श्वेताम्बर सम्प्रदाय को मानते हैं।
किसी रूप में विद्यमान रहा। 8 वीं सदी तक पंजाब में जैन धर्म को दो जातियां प्रमुख रूप पहली जाति का संबंध ओसीया ( राजस्थान) से
एक मान्यतानुसार अग्रवाल जाति का जन्म स्थान हिसार जिले का अग्रोहा गांव जहां विक्रम की 8 वीं शताब्दी में लोहिताचार्य ने अग्रवालों को जैन धर्म में दीक्षित किया । अग्रवाल प्रमुख दिगम्बर परम्परा की जाति है। दिगम्बर पट्टावलियों के अनुसार काष्टा संघ की स्थापना भी अग्रोहा में हुई थी।
इस क्षेत्र में जैन धर्म का प्रसार करने में श्वेताम्बर परम्परा के खरतरगच्छ तथा तपागच्छ के आचार्य यतियों के अतिरिक्त स्थानकवासी व तेरहपंथ मुनियों का प्रमुख योगदान है। महाराज कुमारपाल ने इस क्षेत्र पर विजय प्राप्त कर यहां जैन धर्म फैलाया था। राजा कुमारपाल के समय जैन धर्म काश्मीर और गंधार तक पनप चुका था ।
आचार्य उद्योतन सूरि रचित कुवलयमाला ग्रंथ में पंजाब में जैन धर्म की छठी सदी की स्थिति का पता चलता है।
खरतरगच्छ के दादा श्री जिनचन्द्र सूरिजी और दादा श्री जिनकुशल सूरि ने अनेकों स्थलों पर जैन धर्म का प्रचार प्रसार किया। कालकाचार्य कथा में 2 सरी सदी में पंजाब में जैन धर्म की स्थिति का अच्छा विवरण है। समस्त मुस्लिम शासकों के साथ जैनाचार्यों के अच्छे सम्बन्ध रहे हैं। इस क्रम में जिनप्रभु सूरि, हीराविजय जी, जिनचन्द्र सूरि आदि श्वे. जैनाचार्यों के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं।
इस संदर्भ में हम एक ग्रंथ विज्ञप्ति त्रिवेणी का उल्लेख जरुर करना चाहेंगे। प्रस्तुत ग्रंथ मुनि श्री जिनविजय जी ने ढूंढा था। इस ग्रंथ में विक्रम की 14-15 वीं शताब्दी के जैन धर्म पर अच्छा प्रकाश पड़ता है।
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अर्हत् वचन, अप्रैल 99