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अर्थ : जीवात्मा कर्म करने में स्वतंत्र है। स्वयं उसका फल भोगता है। स्वयं संसार में भ्रमण करता है और स्वयं ही उससे मुक्त होता है।
वाचा शौचं च मनस: शौचमिन्द्रयनिग्रहः ।
सर्वभूतदयाशौचमेतच्छौचं परार्थि नाम्॥" अर्थ : मन से वाणी की पवित्रता, संयम से इन्द्रियों की पवित्रता और सब प्राणियों के प्रति दया भाव रखने से आत्मा पवित्र होती है।
पुष्पै गन्धं तिले तैलं काष्ठे अग्नि: पयसि घृतम्।
इक्षौ गुडं तथा देहे पश्यात्मानं विवेकतः।।20 अर्थ : जिस प्रकार पुष्प में गन्ध, तिल में तैल, लकड़ी में आग, दूध में घी और गन्ने - में गुड़ नहीं दिखाई देता, उसी प्रकार मनुष्य के शरीर में अदृश्य आत्मा का निवास है। इस रहस्य को मनुष्य स्वविवेक से ही समझ सकता है।
मुक्तिमिच्छसि चेतात! विषयान विषवत त्यज।
क्षमार्जवदयाशौचं सत्यं पीयूषवत् पिब।" अर्थ : यदि मुक्त होना चाहते हो तो विषयों को विष के समान छोड़ दो। क्षमा, आर्जव (सरलता), दया व शुद्धि को अमृत मानकर ग्रहण करो।
बन्धाय विषयासको मुक्तये निर्विषयं मनः।
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ।।22 अर्थ : मनुष्य के बन्धन और मोक्ष प्राप्ति का कारण केवल मन ही है। विषय वासनाओं
में फंसा हुआ मन मनुष्य के बंधनों का कारण होता है। जिस मनुष्य का मन विषय वासनाओं से अछूता है, वह मोक्ष का भागी बनता है।
देहाभिमाने गलिते ज्ञानेन परमात्मनि।
यत्र तत्र मनो याति तत्र तत्र समाधयः ।। अर्थ : शरीर को मनुष्य चाहे जितने यत्न से संभालकर रखे तो भी यह नष्ट हो जाता
है यह परमात्म ज्ञान है। इस ज्ञान के होते ही मनुष्य का मन जहाँ कहीं भी जाता है वहीं उसके लिए समाधि बन जाती है। अभिप्राय यह है कि यह शरीर क्षणभंगुर है, यह ज्ञान होते ही मनुष्य का देहाभिमान नष्ट हो जाता है।
पुनर्वितं पुनर्मित्रं पुनर्भार्या पुनर्मही।
एतत्सर्व पुनर्लभ्यं न शरीरं पुन: पुनः ।।24 अर्थ : धन, मित्र, पत्नि, भू संपत्ति बार - बार मिल सकते हैं किन्तु मानव जन्म बार - बार नहीं मिलता। इसका सदुपयोग करना चाहिए।
एक एव पदार्थस्तु त्रिधा भवति वीक्षितः।
कुणय: कामिनी मांसो योगिभि: कामिभि: श्वभिः ।।25 अर्थ : एक ही पदार्थ देखने वालों के दृष्टिकोण की भिन्नता के कारण तीन व्यक्ति उसे
अलग - अलग रूपों में देखते हैं। उदाहरण स्वरूप सौन्दर्य मय नारी का शरीर एक योगी की दृष्टि में शवरूप होता है, कामी पुरूष उसे सौंदर्य के भंडार के रूप में देखता है और कुत्तों के लिए वह मांस पिंड है।
यस्य चित्रं द्रवीभूतं कृपया सर्वजन्तुषः।
तस्य ज्ञानेन मोक्षेण किं जटाभस्मलैपनैः ।।26 अर्थ : जिस मनुष्य का मन प्राणियों को संकाटावस्था में देखकर द्रवित हो जाता है उस अर्हत् वचन, अप्रैल 99
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