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चल सकता है।
उद्योगे नास्ति दादिद्रयं जपतो नास्ति तापकम्।
मौनेन कलहोनास्ति, नास्ति जागरिते भयम्॥ अर्थ : परिश्रमी कभी निर्धन नहीं रह सकता। जप करने वाले के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। मौन से कलह नहीं होता। जागृत व्यक्ति को कभी भय नहीं होता।
धर्मार्थ काममोक्षाणां यस्यैकोऽपि न विद्यते
जन्म-जन्मानि लोकेषु मरणं तस्यं केवलम।" अर्थ : मानव देह बड़े भाग्य से मिलती है। मानव देह मिलने के पश्चात भी जो व्यक्ति
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष को नहीं समझता उसका जन्म निरर्थक है। वह तो संसार में बार - बार मरने के लिए जन्म लेता है और जन्म लेने के लिए ही मरता है।
कर्मायतं फलं पुंसां बुद्धि कर्मानुसारिणी।
तथापि सुधियश्चार्या: सुविचार्यैव कुवते॥2 अर्थ : मनुष्य को कर्मानुसार फल मिलता है और बुद्धि भी कर्मफल से ही प्रेरित होती है। इसे स्वीकार करते हुए विद्वान विवेकपूर्णता से ही कार्य करते हैं।
दृष्टिपूतं न्यसेतपादं वस्त्रपूतं पिबेजलम्।
___ शास्त्रपूतं वदेद्वाक्यं मन: पूतं समाचरेत्॥" अर्थ : मनुष्य अच्छी प्रकार देखकर कदम आगे बढ़ाये, वस्त्र से छानकर जल पिये, शास्त्र के अनुकुल वाक्य बोले तथा मन से सोच विचार कर श्रेष्ठ व्यवहार करे।
आयु: कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च।
पन्चैतानि हि सूज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः ।। अर्थ : माँ के गर्भ में आना, उसका जीवन मरण, समय प्रकार, सुख - दुख, अच्छा बुरा, ___ यश अपयश सब कुछ कर्म द्वारा ही पूर्व निर्धारित होता है।
नास्ति कामसमो व्याधिर्नास्ति मोहसमो रिपुः।
नास्ति कोपसमो वहिर्नास्ति, ज्ञानात्परं सुखम्॥ अर्थ : काम एक असाध्य रोग है, मोह अजेय शत्रु है, क्रोध अग्नि के समान दाहक है, तथा आत्मज्ञान परम सुख है।
जन्म मृत्यू हि यात्येको भुनक्त्येक: शुभाऽशुभम्।
नरकेषु पतत्येक: एको याति परां गतिम्॥" अर्थ : मनुष्य जन्म भी अकेला ही लेता है। मृत्यु का वरण भी अकेला ही करता है।
अपने शुभ-अशुभ कर्मों का फल भी स्वयं ही भोगता है। नारकीय कष्टों को भी अपने कर्मफलानुसार अकेला ही भोगता है और परमगति भी अकेला ही पाता है।
श्रुत्वा धर्म विजानाति श्रुत्वाव्यजति दुर्मतिम।
श्रुत्वा ज्ञानमवाप्रोति श्रुत्वा मोक्षम्वाप्नुयात॥" अर्थ : मनुष्य (सुन) श्रवण कर धर्म में स्थिर होता है, सुनकर ही मनुष्य दुर्गति का त्याग
करता है, सुनकर ही ज्ञानवान होता है और सुनकर ही मोक्ष प्राप्ति का साधन करता है।
स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयं तत्फलमश्नुते। स्वयं भ्रमति संसारे स्वयं तस्माद विमुच्यते॥
अर्हत् वचन, अप्रैल 99