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मनुष्य को जटा बढ़ाने, भस्म लगाने, ज्ञान प्राप्त करने तथा मोक्ष के लिए प्रयत्न करने की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती।।
पठन्ति चतुरो वेदान धर्मशास्त्राण्यनेकशः।
आत्मानं नैव जानन्ति दर्वी पाकरसं यथा॥27 अर्थ : आजकल के पंडित वेद और धर्मशास्त्रों को तो पढ़ लेते हैं किन्तु आत्मज्ञान को
नहीं जानते-वे उसी प्रकार होते हैं जैसे स्वादिष्ट पकवानों से गुजर कर भी बेजान कलछी स्वाद विहीन रहती है।
इन नीति सूत्रों का अध्ययन आपने आप में अनोखा अनुभव है। संभवत: अब तक ज्ञात जैन सिद्धांतों की यह संस्कृत में प्राचीनतम अभिव्यक्ति है। इससे पहले शास्त्ररूप में जैन सिद्धांत अवश्य रहे होंगे इस का चाणक्य के अर्थशास्त्र से संकेत मिलता है। 'चाणक्य नीति' पुस्तक के संपादक ने चाणक्य परिचय में लिखा है 'यह ग्रन्थ भी शताब्दियों तक अंधकार में खोया रहा। काफी समय बाद पुरानी पाण्डुलीपियों के बीच मूल प्रति के रूप में, चाणक्य की हस्तलिपि में मिला और इसका प्रकाशन संसार हित में सुलभ हो सका। यदि पुन: अर्थशास्त्र की इस मूल क ति को देखा जाय और इसके साथ रखी पांडुलिपियों को पढ़ा जा सके तो इतिहास के संदर्भ और समृद्ध हो सकते है।'
भूतबलि (ई. 66 - 156) द्वारा रचित षटखंडागम को श्रुतावतार माना गया है। समस्त दि. जैन संदर्भ यही कहते हैं पर जो बातें चाणक्यनीति में (ई. पर्व 325 के आर कही गई वे भी तो जैन सिद्धांतों के आधार हैं किन्तु उन्हें आगम का हिस्सा नहीं माना गया। इसका कुछ भी कारण हो किन्तु जैन साहित्य के सूत्र चाणक्य और उसके पहले तक जाते हैं। जैन शोधार्थियों को इसे गंभीरता से लेना होगा। चाणक्य अर्थात भद्रबाहु प्रथम के काल व श्रुतावतार के बीच कम से कम करीब 350 - 375 साल का अंतर है तो क्या जैन मनीषियों ने इस बीच कुछ नहीं लिखा? इस प्रश्न का उत्तर हमें ढूँढना ही होगा।
संभवत: आगम उसे ही माना गया जिसमें शुद्ध सिद्धांतों का ही विवेचन हो और अन्य जैन संदर्भो को ठुकरा दिया गया हो। इन सबको पहचानना अत्यंत आवश्यक है। इन्हें पहचाने बिना वह खाई नहीं पटेगी जो जैन इतिहास की वास्तविकता को अपने में दबाये बैठी है।
यहाँ यह दोहराना ठीक रहेगा कि आचार्य चाणक्य के बारे में केवल जैन संदर्भ ही पूर्ण विवरण देते हैं। जैनेतर संदर्भ उनके उत्तरवर्ती जीवन के बारे में मौन हैं। कवि हरिषेण ने लिखा है 'अपना लक्ष्य पूरा कर चाणक्य ने जैन दीक्षा ले ली। वह अपने 500 शिष्यों के साथ गतियोग (पदयात्रा) से दक्षिणापथ स्थित 'वनवास' स्थल पर पहुँचा और वहीं से महाक्रोचपुर में एक गोकुल नाम के स्थान में वह ससंघ कायोत्सर्ग मुद्रा में बैठ गया। वहीं सुबन्धु नामक मंत्री ने ईर्ष्यावश व बदले की भावना से चाणक्य के चारों ओर घेराबंदी कर आग लगवा दी जिससे सभी साधुओं के साथ उनकी मृत्यु हो गई।' कवि हरिषेण ने अंत में लिखा है कि दिव्यक्रोंचपुर की पश्चिम दिशा में चाणक्य मुनि की एक निषद्या बनी हुई है, जहाँ आजकल (कवि हरिषेण के समय 10 वीं सदी में) भी साधुजन दर्शनार्थ जाते रहते हैं। संदर्भ ग्रंथ - 1. चाणक्य - चंद्रगुप्त - कथानक एवम् राजा कल्किवर्णन: महाकवि रइधूकृत:, संपादन एवम् अनुवाद - डा.
अर्हत् वचन, अप्रैल 99