________________
अर्हत् वचन कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर
वर्ष - 11, अंक - 2, अप्रैल 99, 25 - 31 जैन नीति पर आधारित राजनीति व अर्थशास्त्र
के प्रणेता आचार्य चाणक्य
- सूरजमल बोबरा *
महापंडित आचार्य चाणक्य को, जो विश्वविख्यात ग्रंथ कौटिल्य के रचयिता हैं, सत्ता परिवर्तन करने वाले महाराजनीतिज्ञ के रूप में देखा जाता है। कभी-कभी तो उन्हें कुटिल नीतियों का वाहक भी प्रतिपादित किया गया है। ऐसा लगता है जिस प्रकार प्रथम भारतीय साम्राज्य के शिल्पी चंद्रगुप्त को दस शताब्दियों तक अंधकार में रखा गया, उस के संदर्भो को ओझल कर दिया गया, उसी प्रकार आचार्य चाणक्य भी ओझल रहे। उनके वास्तविक चरित्र को भी धूमिल करने का प्रयत्न किया गया व उनके द्वारा लिखित ग्रंथों को अज्ञातवास झेलना पड़ा। जैन संदर्भ स्पष्ट रूप से कहते हैं कि चाणक्य और चंद्रगुप्त जैन धर्मावलम्बी थे और हो सकता है इसी कारण उनके संदर्भो को धर्मांधों द्वारा नष्ट किया गया और जो बचे उन्हें शताब्दियों तक अज्ञातवास झेलना पड़ा। धन्यवाद है उन ग्रीक इतिहासकारों को जिन्होंने उनकी शौर्य गाथाओं एवम् आदर्श कार्यकलापों की अपने इतिहास ग्रंथों में चर्चा की। उन्होंने उसका "सैण्ड्रोकोट्टोस' के नाम से स्मरण किया। सर विलियम जोन्स भी कम श्रद्धास्पद नहीं, जिन्होंने सर्वप्रथम सुझाया कि ग्रीक इतिहासकारों के "सेण्ड्रोकोट्टोस' ही मौर्यवंशी चंद्रगुप्त (प्रथम) हो सकते हैं। इसी आधार पर प्राचीन भारत के लुप्त इतिहास की खोजबीन की गई और अन्त में यह वास्तविक सिद्ध हुआ। इतिहासवेत्ता राइस डेविस ने अपनी पुस्तक' में लिखा है 'चूंकि चन्द्रगुप्त जैन धर्मानुयायी हो गया था इसी कारण जैनेतरों द्वारा वह अगली 10 शताब्दियों तक इतिहास में उपेक्षित रहा।' इतिहासकार टामस भी इसी मत के हैं। मेगस्थनीज के विवरणों से भी यही विदित होता है कि उसने ब्राम्हणों के सिद्धांतों के विरोध में श्रमणों (जैनों) के उपदेशों को स्वीकार किया था।
चाणक्य के ग्रंथों को भी इसी विभीषिका का सामना करना पड़ा। बहुत बाद में जब राष्ट्रवादी आंदोलन प्रारंभ हुए तो प्राचीन पांडुलिपियों के अन्वेषण में तेजी आई। इसके फलस्वरूप 1905 में 'कौटिलीय अर्थशास्त्र' का पता लगा, जिसे शाम शास्त्री ने 1909 ई. में प्रकाशित किय। कौटिल्य का संपूर्ण जीवन एक प्रयोगशाला था। भारत के प्रथम साम्राज्य का शिल्पी होने का गौरव प्राप्त करने के बाद व उस साम्राज्य का महामंत्री होने के बाद भी वह त्याग - तपस्या की मूर्ति थे। तत्कालीन चीनी यात्री फाह्यान ने लिखा है 'जहाँ का प्रधानंमत्री साधारण कुटिया में रहता है, वहाँ के निवासी भव्य भवनों में निवास करते हैं।'
कौटिल्य 'अर्थशास्त्र' में सिद्धांत और व्यवहार, ज्ञान और क्रिया का अद्भुत समन्वय है। कौटिल्य का अर्थशास्त्र यह भी सूचना देता है कि उनके कई शास्त्र थे जो अब उपलब्ध नहीं हैं। यह ग्रंथ जैन सिद्धांतों के ग्रंथ थे या केवल राजनीतिशास्त्र के ग्रंथ थे, इसका खुलासा नहीं है। किन्तु चाणक्य ने जो कुछ लिखा, जिसका प्रयोग किया उसके उपलब्ध सबूत संकेत करते हैं कि वे राजनीतिशास्त्र के ग्रंथ थे जिनका आधार जैन सिद्धांत थे। आगे की पंक्तियों में हम देखेंगे कि 'नीति' सम्बन्धी जो सूत्र चाणक्य ने दिये हैं वे जैनागम के तत्व हैं जिसे आचार्य चाणक्य ने सहज सरल रूप में जनता के कल्याण के लिए व्यक्त किया। उन्होंने अपने अर्थशास्त्र में स्वयं लिखा है -
*9/2, स्नेहलतागंज, इन्दौर