________________
होता था। दहेज प्रथा जरुर थी परन्तु वह स्त्री धन कहलाता था।
उपरोक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि विवाहित स्त्रियों के शिक्षा की व्यवस्था तो थी मगर शिक्षा हेतु उन्हें प्रेरित नहीं किया जाता था। इस तरह उन्हें आर्थिक रूप से कष्ट नहीं था। फिर भी तत्कालीन समाज के कूटनीतिज्ञों का स्त्रियों के प्रति दृष्टिकोण संकीर्ण कहा जा सकता है तथा इस तरह के मन्तव्य स्पष्ट रूप से स्त्रियों के प्रति उत्पीड़ना को प्रेरित करने में सहायक सिद्ध होते थे। बहु-विवाह एवं वेश्यावृत्ति - मौर्य कालीन समाज में बहुविवाह एवं वेश्यावृत्ति प्रचलित थी। कौटिल्य ने बहविवाह का प्रतिपादन पुत्रों की प्राप्ति की दृष्टि से किया था। 12 परन्तु इस प्रथा के कारण पति का स्नेह विभक्त हो जाता था, जो परस्पर संघर्ष, उत्तराधिकार सम्बन्धी वाद - विवाद, दाम्पत्य जीवन में कटुता लाता था। स्त्री ने भी मनुष्य को वश में करने के लिए अपनी पूरी अर्तनिहित शक्तियाँ लगा दी। यदि वह अपनी अतनिहित शक्तियों को पहचान कर उसे दिशा देते तो मनुष्य समाज जैसा आज है उससे बहुत बढ़कर होता। जिसकी कल्पना भी नहीं का सकती।
अतएव स्पष्ट है कि पुत्र प्राप्ति के लक्ष्य को सामने रखकर किए जाने वाले बहुविवाह प्रथा के कारण एक पति की कई पत्नियों के मध्य वर्चस्व को लेकर संघर्ष बना रहता था। जो कि पत्नी के उत्पीड़न का स्रोत बनता था। विवाह विच्छेद - स्त्री-पुरुष दोनों को विवाह विच्छेद का अधिकार था। कौटिल्य को ही स्त्री का पुरुष के समान विवाह विच्छेद का अधिकार दिलाने का श्रेय है। 13 विवाह विच्छेद के बाद आर्थिक अधिकार का दावा करने स्त्री न्यायालय भी जा सकती थी। इसी प्रकार स्त्रियों के प्रति दण्ड विधान उदार तो नहीं था फिर भी अपराध गुरुता की दृष्टि से वह कठोर भी न था।
उपरोक्त विवरण से ज्ञात होता है कि स्त्रियों को विवाह विच्छेद एवं तत्पश्चात् प्राप्त होने वाली आर्थिक पूर्ति के लिए अधिकार प्राप्त थे जो कि निश्चित ही आदर्श स्थिति है। स्त्रियां पति द्वारा ताड़ित होने पर उनसे विलग हो सकती थीं एवं स्वत: न केवल ताड़ना से बच सकती थीं बल्कि उनका भविष्य भी आर्थिक रूप से सुरक्षित रहने के कारण मानसिक यंत्रणा से दूर रह पाती थीं। सती प्रथा - मौर्य युग में सम्पूर्ण समाज में सती प्रथा का चलन नहीं था चूंकि कौटिल्य ने मौर्य युगीन समाज में पुनर्विवाह एवं नियोग प्रथा की ओर संकेत किया है। 4 यूनानी विवरण से ज्ञात होता है कि कुछ जातियों (कंठयन जाति) में ही सती प्रथा प्रचलित थी। स्ट्रैबो के अनुसार इस प्रथा का लक्ष्य था विधवा स्त्री पुन: किसी युवक के प्रेमपाश में न फँसने पाये। 15 सती होने से इंकार करनेवाली विधवा स्त्री को हेय दृष्टि से देखा जाता था।
उपरोक्त तथ्यों से ज्ञात होता है कि जहाँ एक ओर तत्कालीन कूटनीतिज्ञ विधवा के पुनर्विवाह हेतु पक्षधर थे, वही पर कुछ समाजों में सती प्रथा का प्रचलन था। ऐसे समाजों में स्त्रियाँ न केवल मानसिक रूप से उत्पीड़ित होती थी बल्कि पति के साथ सती होने पर शारीरिक ताड़ना का भी शिकार होना पड़ता था।
अर्हत् वचन, अप्रैल 99