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मौर्य काल में पत्नी उत्पीड़न -
मौर्यकाल भारतीय इतिहास का नवयौवन' माना जाता है। यह युग भारतीय एवं विदेशी संस्कृतियों के सामंजस्य का काल था और संस्कृतियों के इस सामंजस्यात्मक रूप ने ही भारत को नया जीवन प्रदान किया। मौर्य - युग का सूत्रपात क्षत्रिय एवं ब्राह्मण के सफल संयोग का परिणाम था। क्षत्रिय चन्द्रगुप्त एवं ब्राह्मण चाणक्य क्रमश: असाधारण वीरता एवं अद्भुत कूटनीतिज्ञता के परिचायक स्तंभ थे। उत्तरी एवं मध्य भारत को क्रमश: ग्रीक एवं अधार्मिक नन्दों से मुक्त कर चन्द्रगुप्त मौर्य ईसा पूर्व 321 में सिंहासनारूढ़ हुआ एवं सम्पूर्ण भारत को एक राजनैतिक इकाई बनाकर प्रथम बार समन्वित एवं सुसंगठित साम्राज्य की स्थापना कर सम्पूर्ण भारत को एकछत्र के अधीन किया। मौर्य युगीन समाज में नारी की स्थिति अशोक के अभिलेखों, मेगस्थनीज के लेख एवं कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अभिलेखों से प्राप्त होती है। कन्या - मौर्य युगीन समाज में कन्या जन्म की स्थिति दयनीय थी जो इस बात से स्पष्ट होती है कि कौटिल्य ने बहुविवाह का प्रतिपादन पुत्रों की प्राप्ति की दृष्टि से ही किया था। कौटिल्य के अनुसार नियोग सम्बन्ध भी केवल पुत्र प्राप्ति की दृष्टि से ही स्थापित किया गया। इसमें पुत्री का नाम ही नहीं है। कन्या विवाह के लिए कौटिल्य ने यह विधान भी रखा कि रजोदर्शन के तीन वर्ष पश्चात यदि अविवाहित कन्या समाज नाति तथा कुल के पुरुष का स्वत: वरण करती है तो कोई दोष नहीं है, अत: उनकी दृष्टि से 12 वर्ष की कन्या एवं 16 वर्षीय युवक विवाह के योग्य होते थे। विवाह में कन्या को वर चयन की स्वतंत्रता थी परन्तु वहीं स्ट्रेबो ने मौर्य युग में एक अलग प्रकार की वैवाहिक प्रथा का उल्लेख किया जो किसी भी युग में नहीं मिला। उनके अनुसार गरीब पिता भरे बाजार में अपनी कन्या को खड़ा करता था। शंखनाद से बाजार में जनता का ध्यान कन्या की ओर खींचा जाता था। भावी वर वहाँ कन्या का पूर्णत: निरीक्षण करता था और दोनों पक्षों के राजी हो जाने पर कन्या का विवाह उस पुरुष के साथ कर दिया जाता था। इस तरह स्पष्ट है कि कन्या को हेय दृष्टि से देखना तथा उसको शिक्षा से वंचित कर रजोदर्शन के होते ही विवाह कर देने की परम्परा के कारण कन्याएँ समाज में उचित स्थान प्राप्त नहीं कर पाती थीं तथा वे उत्पीड़ना का शिकार बनती थीं। पत्नी - मौर्य युगीन नारी के प्रति कौटिल्य की दृष्टि हेय दिखाई देती थी। परन्तु माँ के रूप में नारी की स्थिति सम्मानजनक थी। जहाँ बह विवाह प्रथा, बाल विवाह, सती प्रथा थी वहीं स्त्रियों की शैक्षणिक स्थिति, आर्थिक स्थिति सामान्य थी। स्त्रियों की शिक्षा पर किसी प्रकार का बंधन नहीं था। कुछ स्त्रियाँ बौद्ध एवं जैन भिक्षुणी के रूप में देशाटन करते हुए भी विद्यार्जन करती थीं। इस समय भी शिक्षिता नारियों के दो रूप प्राप्त होते है। 1. ब्रह्मावादनी एवं 2. सधोवाहा। इस प्रकार ब्रह्मवादनी हमेशा अध्ययन एवं अध्यापन में रत रहती थी। कुछ शिक्षिताओं ने काव्य रचनाएँ भी की थी। परन्तु दूसरी जगह कौटिल्य नारियों को शिक्षा के अयोग्य मानता था उसकी दृष्टि में स्त्री का मस्तिष्क संकुचित होता है।" कौटिल्य नारी को मात्र पुत्रों की उत्पत्ति का साधन मानता था।
इस काल में महिलाओं की आर्थिक स्थिति उन्नत थी, उसे पति की सम्पत्ति पर पूरा अधिकार था। यदि पति तलाक दे तो भी सम्पत्ति एवं आय का कुछ भाग प्राप्त
अर्हत् वचन, अप्रैल 99