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________________ अर्हत्व कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर वर्ष - 11, अंक- 2, अप्रैल 99, 19-24 बौद्ध एवं मौर्य काल में पत्नी उत्पीड़न ■ जयश्री सुनील भट्ट * पूर्व वैदिक काल की समानता पर आधारित व्यवस्था उत्तरवैदिक के अन्त तक पूर्णतः परिवर्तित हो गई। पूर्व वैदिक व्यवस्था में जहां पर स्त्री एवं पुरुष के संबंध मित्रता पूर्ण थे वहीं पर उत्तरवैदिक में पुरुष अपनी पत्नी का गुरु बन गया तथा अन्ततः वह पत्नी का देवता बन गया। देवता बन जाने के कारण हिन्दू परिवार में पति को राजा के समान निरंकुश अधिकार प्राप्त हुए। उसकी इच्छा ही कानून था। पति की निरंकुश तथा शासक प्रवृत्ति के कारण पत्नी के शोषण का सिलसिला तेजी से जारी हो गया । जिस समाज में प्रभुत्वशाली पुरुषों का तंत्र स्त्रियों पर शासन करता है, वह अन्यायपूर्ण उत्पीड़नकारी समाज होता है। ऐसी सामाजिक व्यवस्था में मनुष्य को वस्तु में बदलकर उन्हें अमानुषिक बनाती है। वास्तव में जब पुरुष अपनी पत्नी का शोषण करता है या उसकी आत्म अभिपुष्टि में जानबूझकर बाधक बनता है, वह उत्पीड़न की स्थिति होती है। इसमें हिंसा स्वतः ही अन्तर्निहित होती है। उत्पीड़न का संबंध स्थापित होते ही हिंसा आरंभ हो चुकी होती है। एक बार हिंसा और उत्पीड़न की स्थिति बन जाने पर वह उत्पीड़ित तथा उत्पीड़क दोनों के लिए जीवन और व्यवहार की एक सम्पूर्ण पद्धति उत्पन्न कर देती है। वर्तमान अध्ययन में बौद्ध तथा मौर्य काल में पत्नी के उत्पीड़न के कारकों को ज्ञात किया गया है। इसे मालूम करने के लिए तात्कालीन समाज में कन्या जन्म से लेकर स्त्री जीवन के अन्त तक उसके प्रति सामाजिक व्यवस्था तथा पुरुष प्रधानता के परिप्रेक्ष्य में उससे किये गए शोषण की स्थिति को अध्ययन में शामिल किया गया है। जिसका विश्लेषण कर उत्पीड़न की प्रक्रिया को स्पष्ट किया गया है। वैदिक काल के अंतिम चरण 200 ई.पू. से नारियों की दशा सोचनीय हो गई थी तथा नारी की इस बदतर स्थिति को बौद्ध धर्म ने सहारा दिया। यह ईसा पूर्व छठवीं शताब्दी से लेकर ईसा पूर्व तृतीय शताब्दी तक रहा। बौद्ध धर्म नारी को अलग करके किए जाने वाले जटिल आडम्बरों, हिंसात्मक तथा खर्चीले यज्ञों तथा कर्मकण्डों के घोर विरोधी था । गजानन शर्मा द्वारा "प्राचीन भारतीय साहित्य में नारी' (1971-138) में किये गये उल्लेखानुसार इस काल में न केवल धर्म प्रवण नारियों को ही अपितु कुमारिकाओं, विधवाओं एवं वृद्धाओं, जो तात्कालिक समाज में उत्पीड़ित तथा मानसिक रूप से अशांत थी, लम्पट पति को त्याग करने वाली स्त्रियों, वेश्याओं आदि तिरस्कृत नारियों को भी बुद्ध ने अपने संघ में प्रवेश दिया। इससे उस काल की स्त्रियों की सामाजिक प्रतिष्ठा में बढ़ोत्तरी हुई। भिक्षुणिओं को आजीवन अविवाहित जीवन व्यतीत करने का नियम था । स्त्रियों को मठ में प्रवेश तो मिल गया था, तथा उसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगे। पतन काल में मठ व्यभिचार और वासना के क्रीड़ा स्थल बन गए। जो सामाजिक प्रतिष्ठा बुद्ध ने स्त्रियों को दिलवाई, वह कालान्तर में पुरुष द्वारा भोग विलास तथा व्यभिचार किये जाने के कारण समाप्त हो गई एवं पत्नियों के शोषण का क्रम जारी हो गया तथा स्त्रियां उत्पीड़ना की शिकार होने लगी । - * शोध अधिकारी (गृह विज्ञान), समाजशास्त्र एवं समाजसेवा विभाग, डॉ. हरिसिंह गौर वि.वि., सागर - 470003
SR No.526542
Book TitleArhat Vachan 1999 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnupam Jain
PublisherKundkund Gyanpith Indore
Publication Year1999
Total Pages92
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Arhat Vachan, & India
File Size23 MB
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