SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 15
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org SHRUTSAGAR 13 पोटिलाचारय पासें ते दिक्षा, लेई आराधेइं दुगविध शिक्षा । कोटिवरसनो पाली पर्याय, शुक्रदेवलोकें देव ते थाय पच्चीसमि भविं इहज भरतें, छत्रिकानगरी जितशत्रुवर तिं । भद्रानी कुखें पच्चीस लक्ष, नंदननांमा पुत्र सुदक्ष पोटिलाचारय पासें चारित्र, लेई आराधें पुन्य पवित्र । मासखमणथी थानक वीस, आराधें तीर्थंकर नांम जगीस नीकाचीत बांधी पर्याय पाली, लाख वरसनो भव अजुआली । सागर वीस स्थिति प्रसीद्ध, पामी पुप्फोत्तर देवनी ऋद्धि Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir गांम माहणकुंड ऋषभदत, माहणी देवानंदा विदित । नीचगोतरथी उदरें अवतरीया, केतलें काले हरीइं मनि धरिया आलोची इंद्रि हरिणेगमेष, बोलाव्यो आविं हरख विशेष । हाथ जोडिने नमी हरिपाय, बोल्यो स्यो स्यामि करो पसाय जागी सुपननो करे विचार, सेजथी उठें हरख अपार । जई सिद्धारथराय विनवीयो, राजाई सुपन अर्थ चिंतवीयो सुरपति बोलिं, सांभलि सुजाण, माहण कुले जिन वर्धमान । तिहांथी लेई नई ख्यत्रियकुंडगांम, त्रिशलानि कुखि मुंको अभिराम आगिनाकारी तिहांथी ते चलीयो, कार्य करीनें वेगो ते वलीयो । तिणिकाले तिहां त्रिशलामात, चउदश सुपन देखइं विख्यात मीठी वाण बोल्या माहाराज, अम कुलदीवो जग सीरताज । एहवो पुत्र अनोपम थासें, प्रभातें सुपन पाठक प्रकासें November-2015 चोवीशमो जिनवर तुम कुल उपन्न, राजा सुणीनें हर्ष्या निज मन्न । माता त्रिशला हवें गर्भ प्रतिपालें, टाढा उन्हादिक आहारनिं टालें For Private and Personal Use Only थीर रह्या माता अनुकंपा आंणी, ज्ञानथी मातादिक दुख जांणी । गर्भथी हाल्या हर्ष अपार, आगलि सुणयो जन्माधिकार ॥२२॥ ॥२३॥ ||२४|| ॥२५॥ ॥२६॥ ॥२७॥ ॥२८॥ ॥२९॥ ॥३०॥ ॥३१॥ ॥३२॥ ॥३३॥
SR No.525304
Book TitleShrutsagar 2015 11 Volume 01 06
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiren K Doshi
PublisherAcharya Kailassagarsuri Gyanmandir Koba
Publication Year2015
Total Pages36
LanguageGujarati
ClassificationMagazine, India_Shrutsagar, & India
File Size4 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy