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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org श्रुतसागर 12 पूछें भरत को स्वामी अवदात, भरत मध्यें कोई तुम सरिखो तात । चोवीसीमांहि तीर्थंकर थासें, पुरषदमांथी प्रभुजी प्रकासें Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir पुत्र छिं ताहरो मरिचि अभिधांन, इह चोवीसीइं जिन वर्धमांन । मुका राजधांनी प्रीयमीत्र नांम, चक्रीसर थासें ते अभिराम त्रिपृष्टनांमा इहज भरतें, हरिवर थासें तेह सुणंतिं । आवि मरिचि नई नमी कहें राय, लाभ जे मोटा तुज वसु थाय भाविजिन बांदि नगर संचरिओ, कुलमदस्युं तव मरिचि परवरियो । मदनां जोराथी नीचकुले भलीयो, अन्यदा कपिल तेहनें मिलयो ‘इत्थं इहयंपि’ वचन ओचरियो, सागर कोडाकोडि भव अनुसरियो । पूर्व चोरासी लख आयु पाली, बह्मलोकें दश सागर, शालि नवम्बर २०१५ असितिलखपूर्व कोल्लाक विप्र, पुष्फलख बिहोतेर पूर्व्वायुविप्र । पालि, सौधर्मे देव ते थाय, आगलि सुणयो जेह कहिंवाय षष्टिलख पूरव अग्निद्योत नाम, इशांते सूर ते हुओ शुभ ठांम । मंदर सन्निवेश पंचावन लाख, पूव्वार्यु अग्निभूत ब्राह्मण भाख चीजें कल्पें सुर, चिउंआलीसलक्ष, आयु भारद्वाज विप्र सुदक्ष । र महेंद्र देवता थाय, केतलोकाल विचमांहिं जाय राजग्रहि नगरि लाख चोत्रीस, पुरव आयु थावर जगीस । त्रिदंडी वेश सातभव सेव, ब्रह्मदेवलोकें मध्यस्थिति देव कोटिवर्षायु विश्वभूतिनाथ, युवराज पुत्र थयो ते जांम । संभूतमुनि पासें चारित्र, वरसहजार तपसु पवित्र बहु बल होयो एहवुं नीआंण, करी सातमें सुरलोक ठाण । सत्तरमई भवें देवता हुओ, हवें जे आगलि थायें ते जूओ तिहांथी मरिनें हरिवर थाय, त्रिपृष्ट नांमा जे जग गाय । पाप बहुलां तिणिं भवे कीध, सातमी नरके अवतार लीध चवी नरकथी वनमृगराय, नरकिं वली चौथी बहुभव थाय । मानवभव चोरासीलाख आय, प्रीयमीत्रनांमा चक्रीसर थाय For Private and Personal Use Only 11811 ॥१०॥ ॥११॥ ॥१२॥ ॥१३॥ ।।१४।। ॥१५॥ ॥१६॥ ॥१७॥ 118211 ॥१९॥ ॥२०॥ ॥२१॥
SR No.525304
Book TitleShrutsagar 2015 11 Volume 01 06
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiren K Doshi
PublisherAcharya Kailassagarsuri Gyanmandir Koba
Publication Year2015
Total Pages36
LanguageGujarati
ClassificationMagazine, India_Shrutsagar, & India
File Size4 MB
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