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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir श्रुतसागर 39 जनवरी-फरवरी - २०१५ गुजरातमां व्याकरण ग्रंथोमां पहेलुं स्थान कालापकने अने बीजुं स्थान कातंत्रने मळेलुं हतुं. गुजरातमां रचायेला ग्रंथोमां प्रमाणरूपे ज्यां व्याकरणना सूत्रो मळी आवे छे त्यां मोटे भागे आ ज बे व्याकरणनां होय छे. पाणिनीना व्याकरणनुं अध्ययन-अध्यापन गुजरातमा घणुं ओर्छ थतुं. गुजरातनी माफक बंगाळमां पण जूना जमानानां, मोटे भागे आ बंने व्याकरणोनो प्रचार वधारे हतो ए वात बंगाळी विद्वानोए ए व्याकरणो उपर लखेली संख्याबंध टीका वगेरेथी जाणी शकाय छे. जैनेतर विद्वानोनी माफक जैन विद्वानोए पण ए ग्रंथो उपर घणां टीकाटिप्पण लख्यां छे ते उपरथी जैनोमां पण ए संपूर्ण सिद्धहेमशब्दानुशासन नामे व्याकरणना प्रादुर्भाव पछी जैनसमाजमांथी उक्त जूनां व्याकरणोनो आदर ओछो थयो. हेमचंद्रनी जेम बीजा पण जैन विद्वानोए व्याकरण उपर स्वतंत्र रचनाओ करेली छे परंतु तेमांनी कोइने पण हेमचंद्रनी रचना जेवं विशेष स्थान मळ्युं नथी. आ यादीमां हेमचंद्रना उपरांत चार स्वतंत्र व्याकरण ग्रंथो जैन विद्वानोना छे. १. विद्यानंद २. मुष्टिव्याकरण ३. जैनेन्द्रव्याकरण अने ४. शाकटायन व्याकरण. व्याकरणविषयक जेटला ग्रंथोनां नाम आ यादीमा आप्यां छे तेमां नं. ८ प्रमेयपद्यावली, नं. २४ सज्जनरंजनव्याकरण, नं. ५६ दुर्गाचार्यकृत प्राकृतव्याकरण, नं. ६० श्रीभोजकृतप्राकृतव्याकरण वगेरे ग्रंथ खास ध्यान खेंचे एवा छे. आ ग्रंथो वर्तमानमा क्यांये पण जाणमां नथी. दुर्गाचार्य अने भोजकृत प्राकृत व्याकरणश्लोक प्रमाण ४००० जेटलुं लख्युं छे. ए जोतां प्राकृत भाषा माटे ए व्याकरणो घणां ज विस्तृत अने तेटला माटे विशेष उपयोगी होवां जोईए. कोषग्रंथोमां नं. ६४ मां नोंधेली धनपाल पंडितनी नाममाला, अने ६५मां नोंघेली लावण्यवतीनाममाला खास ध्यान खेंचे छे. धनपालनी रचेली पाइयलच्छी नामे प्राकृत नाममाला तो उपलब्ध छे परंतु तेनी श्लोक संख्या जूज छे. ज्यारे आमां नोंधेली नाममालानी श्लोक संख्या १८०० छे तेथी प्राकृत करतां आ नाममाला जूदी ज होवी जोइए, अने ते संस्कृत नाममाला होय एम संभवे छे. । धनपाले संस्कृतनो शब्दकोष रच्यो हतो तेनो पुरावो तो खुद हेमचंद्राचार्यना १. प्राचीन समयमां ग्रंथोनुं माप श्लोकथी कहाडवामां आवतुं. श्लोक एटले के अनुष्टुपना चार पादमां आवे छे ते प्रमाणे ३२ अक्षरोनो समूह. आ मापे अक्षरोने गणी ग्रंथ- श्लोकपूर नक्की करवामां आवतुं. For Private and Personal Use Only
SR No.525297
Book TitleShrutsagar 2015 01 02 Volume 01 08 09
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiren K Doshi
PublisherAcharya Kailassagarsuri Gyanmandir Koba
Publication Year2015
Total Pages82
LanguageGujarati
ClassificationMagazine, India_Shrutsagar, & India
File Size7 MB
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