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श्रुतसागर - २६
३९ विचरता कोई गुरुभगवंत तगरा नगरीमां पधारे छे, गुरुभगवंतनी देशनाथी दत्त अने तेनी पत्नीनु हृदय परिवर्तन पामे छे, पोतानी पत्नी अने पुत्र साथे गुरुदेव पासे दीक्षा ले छे. पुत्र अरणिक मुनिवर उपर अनन्य स्नेह भाव होवाथी पठन-पाठन सिवाय अन्य कांई ज कार्यनो भार न हतो, गुरुदेव साथे विहार करी निरतिचार चारित्रनुं पालन करता अनेक वर्षांना व्हाणा वीते छे. समय बदलाय छे, पिता मुनिनो काळधर्म थाय छे.
ढाल पहेली कडी-७ (कडी क्रमांक १६-२३) राग मारणी अत्यार सुधीनी अरणिक मुनिनी जीवन चर्यानुं समग्रपणे रूपांतर थई जवानुं हतुं. अरणिकनो कमळनी पांदडी जेवो देह, अने पिता-मुनिना वात्सल्य भावे, अरणिकने कोई कष्ट मळे के अधिक परिश्रम पहोंचे एवं कोई कार्य करवानो अवसर ज नहोतो आव्यो. हवे गोचरी-पाणी विगेरे लाववानुं अरणिक मुनिना फाळे आव्युं. अरणिकना स्मरण हिंडोळे पितानी साथै वितावेला दिवसो झूल्या करे छे. क्यारेक मीठावचनो याद आवे छे, तो क्यारेक पिताए कोळीयामां काळजानो प्रेम पूरीने वपरावेलो आहार याद आवे छे. क्यारेक पिता मुनिए करेली आराधनानी स्मृत्ति मनने आई करे छे. तो पिताए काळजीथी करेलुं जतन याद आवे छे. रमकडां रमवानी उमरमां पिताना पडछाये नीकळेला युवान अरणिक मुनिने पितानो खालीपो हृदयमा चीरा पाडे छे, वियोग केमे करी सहेवातो नथी. आग अने वियोग बन्ने दहन-मूलक छे. आग तो पाणीथी ओलवाई जाय, पण वियोग क्यारेय .....
साध्वी माता भद्रा आवी, समजावे छे, एना वचनोथी अरणिक स्थिर बनी, गुरुदेवना चरणोमां निरतिचारपणे चारित्र जीवनने व्यतीत करे छे. जे क्यारेय भूलाता नहोतां, ए क्यारेक याद आवी जाय छे. दिवसो पसार थाय छे... ढाल बीजी, कडी-९ (कडी क्रमांक २४-३३) राग गोडी - रामचंदकी
वागि चंपउ मुनि रहिउरी ए ढाल वैशाख मासनो धोम-धखतो तडको पड़ी रह्यो छे, धरती अने आकाशमाथी एक सरखो ताप पड़ी रह्यो छे, रस्ते पथरायेली रेतीना कणीया अंगारा लागे एवा तडकामां मुनि अरणिक स्थविर साधु साथे गोचरी नीकळ्या छे, वायरामां वरसती लू सूरजनी गरमीमां वधारो करे छे. जीभ अने ताळ, सूकाई जाय एवो सूर्य तपे छे. माछली अने जलनुं उदाहरण आपी कविए ऋषिने लागती गरमीना वर्णनने वधु तादृश कर्यु छे.
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