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________________ गाहा : उप्पायंतो पीडं मुणीण सम-सत्तु मित्त- वग्गाणं । पाविट्ठ! कत्थ वच्चसि दिट्ठी- मग्गम्मि मह पडिओ ? । । १२ । । संस्कृत छाया : उत्पादयन् पीडां मुनीनां सम- शत्रु-मित्रवर्गाणाम् । पापिष्ठ! कुत्र व्रजसि दृष्टि मार्गे मम पतितः ? ।। १२ । । - गुजराती अनुवाद : आखा विश्वने मित्र माननारा, शत्रु अने मित्र पर समान दृष्टिवाळा मुनि ने पीड़ा करतां तुं मारा वड़े देखायो छे। हे पापिष्ठ! हवे तुं क्यां जईश? हिन्दी अनुवाद : सम्पूर्ण विश्व को मित्र माननेवाले, शत्रु और मित्र पर समान दृष्टि रखने वाले मुनि को पीड़ा देते हुए तूं मेरे द्वारा देखा गया है। हे पापिष्ठ! अब तूं कहाँ जायेगा ? गाहा : एवं च मए भणिए भवणंवई सो सुरो ससंभंतो । नट्ठो सहसा ताव य सुक्क- ज्झाणे पविठ्ठस्स ।। १३ ।। मुणिणो मोहावगमा उप्पन्नं केवलं वरं नाणं । केवलि - महिमा विहिया तओ मए परम विणणं ।। १४ । । B संस्कृत छाया : एवं च मयि भणिते भवनपतिः स सुरः ससम्भ्रान्तः । नष्टः सहसा तावच्च शुक्लध्याने प्रविष्टस्य ।। १३ ।। मुने - महापगमादुत्पन्नं केवलं वरं ज्ञानम् । केवलि - महिमा विहितस्ततो मया परम - विनयेन ।। १४ ।। ( युग्मम् ) गुजराती अनुवाद : आ प्रमाणे मे कह्युं त्यारे ते भवनपति देव गभरायेलो तरत त्यां थी भाग्यो : अटली वारमां शुक्लध्यानमां प्रवेशेला ते मुनि ने मोहनीयकर्म ना नाश थी श्रेष्ठ एवं केवलज्ञान उत्पन्न थयुं अने परम विनयपूर्वक में तेमनो केवलज्ञान महोत्सव कर्यो!
SR No.525094
Book TitleSramana 2015 10
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSundarshanlal Jain, Ashokkumar Singh
PublisherParshvanath Vidhyashram Varanasi
Publication Year2015
Total Pages170
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Sramana, & India
File Size15 MB
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