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________________ (सम्यग्दर्शन-मूल) गाहा : अवि य सम्म - हंसण- मूलो पंच- महव्वय - महल्ल - दढ - खंधो । समिई- गुत्ती - तव - संजमाइ - साहा - पसाहिल्लो ।। १०८ । । विविहाभिग्गह- गोच्छो मणहर- सीलंग- पत्त - सोहिल्लो । वर- लद्धि - कुसुम - कलिओ सग्ग - ऽपवग्गाइ - सुह - फलओ । १०९ । चारित - कप्प - रुक्खो वित्थरओ साहिओ जिणाणाए । दुह ताव- तावियाण जियाण सरणं अणन्न- समं । । ११० । । ( चारित्र कल्पवृक्ष) संस्कृत छाया : अपि च सम्यग्दर्शनमूलः पञ्चमहाव्रतमहा-दृढस्कन्धः । समिति - गुप्ति- तपः संयमादि- शाखा प्रशाखावान । । १०८ । । विविधाभिग्रह - गुच्छो मनोहर शीलाङ्गपत्रशोभावान् । वरलब्धि - कुसुमकलितः स्वर्गापवर्गादिसुखफलदः ।। १०९ ।। चारित्रकल्पवृक्षो विस्तरतः कथितो जिनाज्ञया । दुःखतापतप्तानां जीवानां शरणमनन्यसमम् ।। ११० । । त्रिभिः कुलकम् N गुजराती अनुवाद : अने ते आ प्रणाणे - सम्यग् दर्शन जेनु मूल छे - पांच महाव्रत रूप मोटो दृढ जेनो स्कंध छे, समिति - गुप्ति-तप- अने संयम विगेरे जेनी शाखाप्रशाखा छे । विविध अभिग्रहरूप जेना गुच्छा छे, मनोहर ( आचार) शीलांग रूप पत्रोथी जे शोभे चे, श्रेष्ठ लब्धिरूप पुष्पोथी जे रमणीय छे, स्वर्ग अने मोक्ष विगेरे जेना अनन्य सुखरूपी फल छे। तीव्र दुःखरूपी तप्त प्राणीओने अनन्य शरणरूप एवो कल्पवृक्ष समान चारित्रधर्म जिनाज्ञा वडे विस्तारपूर्वक कहेवायो। हिन्दी अनुवाद : वह इस प्रकार सम्यक् दर्शन जिसका मूल है— पाँच महाव्रतरूपी विशाल और दृढ़ जिसका स्कन्ध है, समिति - गुप्ति-तप तथा संयम आदि जिसकी शाखा - प्रशाखा हैं, विविध अभिग्रहणरूप जिसके गुच्छे हैं, मनोहर (आचार) शीलांगरूपी 551
SR No.525071
Book TitleSramana 2010 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShreeprakash Pandey
PublisherParshvanath Vidhyashram Varanasi
Publication Year2010
Total Pages272
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Sramana, & India
File Size20 MB
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