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विज्ञान के क्षेत्र में अहिंसा की प्रासंगिकता : ७९
मनुस्मृति में भी स्पष्ट कहा गया है- जो कार्य तुम्हे पसन्द नहीं है, वह कार्य दूसरों के लिए कभी मत करो। 'आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत'। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, पवित्रता, इंद्रिया-निग्रह ये ऐसे धर्म हैं जो चारो वर्गों के लिए अनिवार्य हैं। पहले विश्व में तीन ही रोग थे- इच्छा, भूख और जरा, किन्तु पशुवध प्रारम्भ होने पर सत्तानवे नये रोग पैदा हो गये। शत्रु को मित्र बनाना, दानव को मानव बनाना और अज्ञानी को ज्ञानी बनाना यह अहिंसा की सद्भावना वृत्ति से सम्भव है। हिंसा से उत्पन्न घाव पर स्नेह का मरहम और दया की पट्टी लगाओ, ऐसा लाओत्से का कथन है। अहिंसा का मूल आधार समता है। समता से आत्मसाम्य की दृष्टि प्राप्त होती है। विज्ञान भी तो समता ही सिखाता है। वह कहता है कि बहुत से प्राणियों की शरीर रचना समान है। शरीर में समानता है, आत्मा में समानता है तो हनन किसका करें? क्यों करें? और कैसे करें?
जैन दर्शन एक वैज्ञानिक दर्शन है इसमें कोई संदेह नही। जैन दर्शन की मान्यताएँ आधुनिक विज्ञान के समान व्यावहारिक एवं तर्कसंगत हैं। दर्शन मानव मूल्यों की रक्षा करता है तथा विज्ञान जीवन को गतिशीलता प्रदान करता है। आज विज्ञान के सहयोग से मनुष्य ने गतिशीलता को पाया है परन्तु मानवीय मूल्यों की संकल्पना को नजरअंदाज कर दिया गया है। फलतः उसके जीवन में विवेकशून्यता पशुता आदि जैसे भावों का बोलबाला हो गया है। अतः एक सुसम्पन्न और विकसित राष्ट्र के लिए विज्ञान और दर्शन को साथ-साथ लेकर चलना होगा तभी सही माने में विकास सम्भव है।
विज्ञान और धर्म दोनों हमारे जीवन के लिए उपयोगी हैं। विज्ञान की दो विधाएँ हैं- एक तो है प्रयोगधर्मिता और दूसरा है विकसित तकनीक। सिद्धान्तानुसार प्रयोग करके निष्कर्ष पर पहुँचने का रवैया विज्ञान का है। यह वैज्ञानिक विकास के लिए उपयुक्त है ताकि अंधश्रद्धा को अवसर न मिले। तकनीकी विकास से जो साधन उपलब्ध हुए उनसे जीवन सुख-सुविधा से भरपूर है। लेकिन मानसिक शान्ति अनुपलब्ध है। विज्ञान और धर्म के तत्त्व एक-दूसरे के विरोधी नहीं, अपितु पूरक हैं। विज्ञान परम्परागत धार्मिक अंधविश्वासों को दूर करने का प्रयास करता है तो धर्म भोगवाद को नियंत्रित करता है। विज्ञान प्रयोगधर्मी है तो धर्म आस्था को मानता है। धर्म के तत्त्व मानसिक रोगों तथा कुण्ठाओं में सहज चिकित्सा करते हैं। विज्ञान के कारण साधनों का अवलंबन पनपता है तो धर्म स्व को विकसित करता है।
विज्ञान ने अपने आविष्कारों को मानव की भलाई के लिए उसके समक्ष रखा, लेकिन विज्ञान के इस ज्ञान का उपयोग अणुबम, परमाणु बम, हाइड्रोजन बम, रासायनिक हथियार (एसिड, पावडर) नक्षत्र युद्ध जैसे भीषणतम एवं संहारक अस्त्र
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