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श्रमण, वर्ष ५९, अंक १ जनवरी-मार्च २००८
विज्ञान के क्षेत्र में अहिंसा की प्रासंगिकता
श्रीमती सरोज गोलेछा*
मानव सभ्यता के प्रादुर्भाव से ही अहिंसा का महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। उस वक्त मानव संस्कृति इतनी विकसित अवस्था में नहीं थी, अतएव अहिंसा का अर्थ व दायरा भी बहुत सीमित था । उस समय अहिंसा का अर्थ मोटे रूप में एक मनुष्य का अन्य मनुष्य के साथ शांतिपूर्वक निवास करना ही माना जाता था । किन्तु आज के वैज्ञानिक युग में, जब मानव सभ्यता एवं संस्कृति इतनी विकसित हो चली है और हिंसा के कई रूप उभर कर सामने आये हैं, तो अहिंसा का अर्थ व उसका दायरा भी विस्तृत हो गया है। आज के विज्ञान युग में व्याप्त भौतिकता ने मानव के आपसी भावुक रिश्तों की नींव हिलाकर हत्यायें, लूटपाट, आत्महत्या, आतंकवाद, तोड़फोड़, आगजनी इत्यादि हिंसा के कई प्रकारों को जन्म दिया है, जिनमें त्रस्त मानव समाज ने अहिंसा के महत्त्व और अहिंसा की आवश्यकताओं को पहले से कहीं ज्यादा और पहले से कहीं व्यापक रूप में अनुभव किया है । 'अहिंसा परमों धर्म के रूप में भगवान महावीर, गौतम बुद्ध, महात्मा गांधी का उद्घोष अब सीमित दायरे से निकलकर विश्व मानव के मन में स्थान बना रहा है। अहिंसा ही आज के युग की प्रमुख मांग है, क्योंकि यह ज्वालामुखी पर बैठे विश्व को बचा सकती है। प्राचीनकाल में कुछ अपवादों को छोड़कर अहिंसा के प्रयोग प्रायः व्यक्तिगत हुये हैं, किन्तु भगवान महावीर, महात्मा बुद्ध, ईसा मसीह आदि महापुरुषों द्वारा प्रतिपादित अहिंसा का मंथन करके महात्मा गांधी ने अनेक सामूहिक प्रयोग कर बताये। अतएव आज अहिंसा का सामूहिक प्रयोग कठिन नहीं है। विज्ञान आज बड़ी तेजी से छलांगें मार रहा है और इस कारण विश्व अत्यंत छोटा बन गया है। वैज्ञानिक सुविधाओं के कारण आज एक देश का मानव दूसरे देश के मानव से अधिक दूर नहीं मालूम होता । अतएव अहिंसा की गति भी तीव्र करनी होगी।
अहिंसा और विज्ञान के क्षेत्र में भिन्नता
आज के युग में धर्म का प्रभाव उत्तरोत्तर क्षीण होता जा रहा है। लोगों में नास्तिकता घर करती जा रही है, इसका एक मात्र कारण है विज्ञान की उन्नति । विज्ञान का प्रभाव आज विश्वव्यापी है। आज से दो शताब्दी पूर्व यह दशा नहीं थी । धर्मपरायण * द्वारा- पापुलर बुक्स एण्ड स्टेशनरी, जयस्तम्भ रोड, राजनांद गाँव (छतीसगढ़)
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