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________________ २६ : श्रमण, वर्ष ५९, अंक १ / जनवरी-मार्च २००८ जीव - अजीव की विस्तृत व्याख्या 1 प्रज्ञापना जीव - अजीव का उनके प्रत्येक सम्भव भेद-प्रभेदों के साथ चर्चा करती है । अजीवों के निरूपण में रूपी, अरूपी नामक दो भेद और उनके प्रभेद किये गये हैं। सूत्र ५ - १३ तक अरूपी अजीवप्रज्ञापना उसके भेद - प्रभेदों - धर्मास्तिकाय, धर्मास्तिकाय का देश, धर्मास्तिकाय का प्रदेश, अधर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय का देश, अधर्मास्तिकाय का प्रदेश, आकाशास्तिकाय, आकाशास्तिकाय का देश, आकाशास्तिकाय का प्रदेश और अद्धासमय (काल) की प्रज्ञापना की गयी है। रूपी अजीवप्रज्ञापना चार प्रकार की है- स्कन्ध, स्कन्धदेश, स्कन्धप्रदेश और परमाणु पुद्गल सूत्र १४ में जीवप्रज्ञापना के स्वरूप की व्याख्या करते हुए उसके दो प्रमुख भेदों - असंसार समापन्न एवं संसार समापन्न जीवों की चर्चा की गयी है। सूत्र १५ से १७ तक असंसार समापन्न जीवों की प्रज्ञापना की गयी है और सिद्ध जीवों के १५ भेद बताये गये हैं । सूत्र १८ से १४७ तक संसार समापन जीवों के भेद-प्रभेदों की चर्चा की गयी है । इसमें एकेन्द्रिय संसारी जीवप्रज्ञापना के पांच प्रकारों की चर्चा हैपृथ्वीकायिक (२०-२५), अप्कायिक ( २६ - २८), तेजस्कायिक (२९-३१), वायुकायिक (३२-३४) और वनस्पतिकायिक (३५-५३) । वनस्पतिकायिक जीवों में प्रत्येक शरीर, बादर वनस्पतिकायिक जीवों के १२ भेद, साधारण शरीर बादर वनस्पतिकायिक जीवों में वृक्षादि के १२ भेदों की व्याख्या की गयी है। सूत्र ५६ से ६० तक द्वीन्द्रिय संसार समापन्न जीवों की जाति एवं योनियां, त्रीन्द्रिय- चतुरिन्द्रिय जीवों की प्रज्ञापना, चतुर्विध पंचेन्द्रिय तथा नैरयिक जीवों की प्रज्ञापना की गयी है । सूत्र ६१ से ६८ तक समग्र पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिक जीवों के भेद, ६९ से ८१ थलचर पंचेन्द्रिय, ८२-८५ आसालिकों की उत्पत्ति, ८६-९१ खेचर पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिक के विविध भेद, ९२-९७ तक समग्र मनुष्य जीव, सम्मूर्च्छिम मनुष्य उत्पत्ति के स्थान, गर्भज के तीन प्रकार, अन्तद्वीपिक मनुष्य के २८ भेद, अकर्मक मनुष्य के तीस भेद तथा कर्मभूमक मनुष्य के दो भेद- आर्य और म्लेच्छ की प्रज्ञापना की गयी है । सूत्र ९८ से १०६ में म्लेच्छ-आर्य के भेद, ऋद्धिप्राप्त आर्यों के ६ भेद, ऋद्धिअप्राप्त आर्यों के ९ भेद, क्षेत्रार्य के २६ भेद, जात्यार्य, कुलार्य के ६-६ भेद तथा कर्मार्य-शिल्पार्य के विविध भेदों का निरूपण किया गया है। सूत्र १०८ से १३८ तक ज्ञानार्य - दर्शनार्य - चारित्रार्य के विविध भेद तथा विविध समीक्षायें दी गयी हैं । सूत्र १३९ से १४७ तक चतुर्विध देवों, दस प्रकार के भवनवासी, आठ प्रकार के वाणव्यन्तर, पांच प्रकार के ज्योतिष्क तथा वैमानिक देवों के दो तथा देवों के विविध रूपों की प्रज्ञापना की गयी है । इसके अतिरिक्त जिन प्रमुख दार्शनिक सिद्धान्तों का निरूपण हुआ है उनमें अस्तिकाय की अवधारणा, जीवों का निवास स्थान, पर्याय, जीव के शरीर, कषाय, इन्द्रिय, लेश्या, कर्म - सिद्धान्त, उपयोग- पश्यत्ता तथा ज्ञान-दर्शन आदि प्रमुख हैं। For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org Jain Education International
SR No.525063
Book TitleSramana 2008 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShreeprakash Pandey, Vijay Kumar
PublisherParshvanath Vidhyashram Varanasi
Publication Year2008
Total Pages138
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Sramana, & India
File Size6 MB
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