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________________ प्रज्ञापना- सूत्र एक समीक्षात्मक अध्ययन : २३ भव-प्राप्ति अथवा (मृत्यु) के अर्थ में भी यहां प्रयुक्त किया गया है। इस प्रकार की अन्तक्रिया का विचार चौबीस दण्डकवर्ती जीवों से सम्बन्धित किया गया है। कर्मों की अन्तरूप अन्तक्रिया तो एक मात्र मनुष्य ही कर सकते हैं। इसका वर्णन छः द्वारों के माध्यम से किया गया है । (१४०६ -- १४७३) अवगाहना-संस्थान या शरीरपद इक्कीसवें अवगाहना-संस्थान या शरीरपद में शरीर की विधि (भेद), संख्यान, प्रमाण, पुद्गलों के चय, शरीरों के पारस्परिक सम्बन्ध, उनके द्रव्य, प्रदेश, द्रव्यप्रदेशों तथा अवगाहना के अल्प - बहुत्व की प्ररूपणा की गयी है । (१४७४ - १५६६) क्रियापद बाईसवें क्रियापद में कायिकी, अधिकरिणिकी, प्राद्वेषिकी, पारितापनिकी व प्राणातिपातिकी इन ५ क्रियाओं तथा इनके भेदों की अपेक्षा से समस्त संसारी जीवों का विचार किया गया है । (१५६७-१६६३) कर्मप्रकृतिपद तेईसवें कर्मप्रकृतिपद के पहले उद्देशक में ज्ञानावरणीय आदि आठ कर्मों में से कौन जीव कितनी कर्मप्रकृतियों को बांधता है, इसका विचार है। द्वितीय उद्देशक में कर्मों की उत्तरप्रकृतियों और उनके बन्ध का वर्णन है । (१६६४ - १७५३) कर्मबंधपद चौवीसवें कर्मबंधपद में ज्ञानावरणीय आदि कर्मों को बांधते हुए जीव कितनी कर्मप्रकृतियां बांधता है ? इसका विचार किया गया है । (१७५४-१७६८) कर्मवेदपद पच्चीसवें कर्मवेदपद में ज्ञानावरणीय आदि कर्मों को बांधते हुए जीव कितनी कर्मप्रकृतियों का वेदन करता है ? इसका विचार किया गया है। (१७६९-१७७४) कर्मवेदबन्धपद छब्बीसवें कर्मवेदबन्धपद में ज्ञानावरणीय आदि कर्मों का वेदन करते हुए जीव कितनी कर्मप्रकृतियां बांधता है? इसका विचार किया गया है। (१७७५-१७८६) कर्मवेदवेदपद सत्ताइसवें कर्मवेदवेदपद में ज्ञानावरणीय आदि कर्मों का वेदन करते हुए जीव कितनी कर्मप्रकृतियों का वेदन करता है? इसका विचार किया गया है। (१७८७१७९२) Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.525063
Book TitleSramana 2008 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShreeprakash Pandey, Vijay Kumar
PublisherParshvanath Vidhyashram Varanasi
Publication Year2008
Total Pages138
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Sramana, & India
File Size6 MB
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