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श्रमण, वर्ष ५९, अंक १/जनवरी-मार्च २००८
व्युत्क्रान्तिपद
छठे व्युत्क्रान्तिपद में बारह मुहूर्त और चौबीस मुहूर्त का उपपात और उद्वर्तन (मरण) सम्बन्धी विरहकाल क्या है? कहां जीव सान्तर उत्पन्न होता है?, एक समय में कितने जीव उत्पन्न होते और मरते हैं? कहां से आकर उत्पन्न होते हैं? मर कर कहां जाते हैं?, परभव की आयु कब बंधती है ? आयुबन्ध सम्बन्धी आठ आकर्ष कौन से हैं-इन आठ द्वारों से जीव की प्ररूपणा की गयी है। (५५९-६९२) उच्छ्वासपद
सातवें उच्छ्वासपद में नैरयिक आदि के उच्छ्वास ग्रहण करने और छोड़ने के काल का वर्णन है। (६९३-७२४) संज्ञापद
आठवें संज्ञापद में जीव के आहार, भय, मैथुन, परिग्रह, क्रोध, मान, माया, लोभ, लोक और औघ, इन दस १० संज्ञाओं का २४ दण्डकों की अपेक्षा से निरूपण किया गया है। (७२५-७३७) योनिपद
नौवें योनिपद में जीव की शीत, उष्ण, शीतोष्ण, सचित्त, अचित्त, मिश्र, संवृत, विवृत्त, संवत्त-विवृत्त, कूर्मोनत, शंखावर्त और वंशीपत्र, इन योनियों के आश्रय से समग्र विचार किया गया है। (७३८-७७३) चरम-अचरम पद
दसवें चरम-अचरम पद में --चरम है, अचरम है, अनेक चरम हैं, अनेक अचरम हैं, चरमान्त प्रदेश हैं, अचरमान्त प्रदेश हैं, इन छ: विकल्पों को लेकर २४ दण्डकों के जीवों का गत्यादि की दृष्टि से तथा विभिन्न द्रव्यों का लोक-अलोक आदि की अपेक्षा से विचार किया गया है। (७७४-८२९) भाषापद
ग्यारहवें भाषापद में भाषा सम्बन्धी विचार करते हुए बताया गया है कि भाषा किस प्रकार उत्पन्न होती है, उसकी आकृति किस प्रकार की है। इसके साथ ही भाषा के प्रकार के अन्तर्गत सत्य भाषा, मृषाभाषा, सत्यामृषा और असत्यामृषा भाषा के क्रमशः दस और सोलह प्रकार बताये गये हैं । सत्य भाषा के दस प्रकार बताते हुएजनपदसत्य, संयतसत्य, स्थापनासत्य, नामसत्य, रूपसत्य, प्रतीतसत्य, अपेक्षासत्य, व्यवहारसत्य, योगसत्य एवं उपमासत्य । मृषाभाषा दस प्रकार की होती है- क्रोधनिश्रित, माननिश्रित, मायानिश्रित, लोभनिश्रित, प्रेमनिश्रित, द्वेषनिश्रित, हास्यनिश्रित, भयनिश्रित
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