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शत-शत वन्दन अभिनन्दन
राकेश मणि त्रिपाठी
माँ सरस्वती के अमरगायक स्वनामधन्य पं० अमृतलाल जी शास्त्री साहित्य जगत् के एक असाधारण मनीषी हैं। उनका व्यक्तित्व जितना सरल, सरस और उदार है, उतना ही उदार उनका दार्शनिक और साहित्यिक चिन्तन भी है। दर्शन के गूढ़ रहस्यों को जितने सरल ढंग से व्याख्या करने की क्षमता पण्डितजी में दृष्टिगत होती है उतना अन्य में दुर्लभ है। पंडितजी का सम्पूर्ण जीवन शिक्षा के प्रति समर्पित है। पण्डित जी प्राय: कहा करते हैं कि एक अच्छा शिक्षक बनने के लिए एक अच्छा विद्यार्थी बनना आवश्यक है। एक अच्छा विद्यार्थी ही एक अच्छा शिक्षक बन सकता है। पंण्डित जी ने अपनी शिक्षण यात्रा स्याद्वाद महाविद्यालय, वाराणसी से प्रारम्भ की और अन्त ब्राह्मी विद्यापीठ, लाडनूं राजस्थान से किया। बीच में न जाने कितने शैक्षणिक पड़ाव आए उन सबका निर्वाह बड़े ही सहज ढंग से किया। जीवन के दार्शनिक और साहित्यिक उतार-चढ़ावों पर चढ़ते-उतरते उनके व्यक्तिव में निखार आया। पण्डितजी केवल जैन दर्शन के ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारतीय दर्शन के प्रकाण्ड विद्वान हैं। कोई भी दार्शनिक समस्या हो उसका समाधान बड़े ही सहज ढंग से कर दिया करते हैं। दर्शन में न्यायशास्त्र का ज्ञान कठिन समझा जाता है, किन्तु न्यायशास्त्र पर पण्डित जी का एकछत्र अधिकार है। न्याय की पुस्तकों का अध्ययन करने दूर-दूर से लोग उनके पास आते हैं।
पण्डितजी व्यक्ति नहीं संस्था हैं। जीवन में ऐसे महापुरुषों के सत्संग का लाभ दुर्लभ है। मैं अपने को धन्य मानता हूँ कि मुझे ऐसे महापुरुष के सम्पर्क में आने का सुअवसर मिला। मैं पण्डित जी के शतायु होने की कामना करता हूँ।
व्याख्याता-ब्राह्मी विद्यापीठ, लाडनूं राजस्थान
सारस्वत साधना के धनी
डॉ० प्रद्युम्न शाह
बनारस में एक लम्बी सारस्वत साधना के साथ अपने वैदुष्य से विद्वानों और विद्यार्थियों के बीच एक आदरणीय स्थान बनाने के बाद पं० अमृतलाल जी जो पं०जी के नाम से जाने जाते रहे हैं-ने अपनी सेवाओं को तेरापंथ धर्मसंघ की विलक्षण संस्था ब्राह्मी विद्यापीठ के लिए अर्पित किया। बनारसवत् पं० जी ने यहाँ भी अपनी ज्ञानगरिमा की छाप छोड़ी। ऋजुमना, उदारमना, सरलमना आदि विशेषण उनके नाम के सामने
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