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________________ ११४ सेवा करते हैं। सिंह आदि पशु भी खेतों की रखवाली में सहायक होते हैं। इस तरह सभी पशु मानव जाति के उपकार में प्रवृत्त हैं। ___मानव समाज को पशु समाज का कृतज्ञ होना चाहिए और उसकी सेवा स्नेह पूर्वक करनी चाहिए। जिस पशु समाज के बिना मानव समाज जीवित नहीं रह सकता, उसे वह दुःख दे, यह उचित नहीं। यज्ञों में पशुओं का हवन होता है, यह बन्द होना चाहिए। आत्म कल्याण के लिए लोग यज्ञ करना चाहते हैं, तो करें, किन्तु हिंसा न करें। भगवान् महावीर ने आत्म यज्ञ का तरीका बतलाया। भगवान् महावीर ने तीस वर्ष की अवस्था में घर बार छोड़ दिया। वे जंगल में चले गए, साधु हो गए और घोर तपश्चरण करने लगे। भगवान महावीर एक सम्मानित राजा के पुत्र थे, अत: उनकी विरक्ति से हजारों मनुष्य विरक्त हो गये और उन्होंने भी निर्मोह होकर दीक्षा ले ली। फलत: भारत के कोने-कोने में इस बात की चर्चा चल पड़ी कि भगवान् महावीर ने भरी जवानी में राज पाट छोड़ दिया और वे निर्जन वन में निर्जल और निराहार रह कर घोर तपश्चरण कर रहे हैं और उन्हें देख कर दूसरे लोग भी उन्हीं के मार्ग का अनुसरण कर रहे हैं। भगवतू महावीर ने साधना के समय बड़े-बड़े कष्ट सहे और वे तप से तनिक भी न डिगे। यों बारह वर्ष का लम्बा समय निकल गया। बारह वर्ष बीतने पर आत्म शुद्धि होते ही उन्हें केवल ज्ञान हो गया। केवल ज्ञान-पूर्ण ज्ञान के होने पर उन्होंने लगातार तीस वर्ष तक जगत् को अहिंसा धर्म का उपदेश दिया। जिनका विचार है कि जगत् की रचना ईश्वर ने की है। वे नाना प्रकार के पाप करके भी ईश्वर को खुश करने के लिए मूक पशुओं की बलि देते हैं। वे सोचते हैं कि उसके प्रसन्न होने से इस लोक में अभ्युदय की प्राप्ति होगी, स्वर्ग मिलेगा और नरकादि गतियों से छुटकारा। इसलिए भगवान् महावीर ने कहा कि ईश्वर न जगत् का नियन्ता है और न कर्ता। आत्मा जब तक संसार में रहती है, तब तक अशुद्ध रहती है और जब वही आत्मा शुद्ध हो जाती है तो परमात्मा कहलाने लगती है। अन्य लोग उसी को ईश्वर कह सकते हैं, किन्तु वे उसे ईश्वर न मान कर एक स्वतन्त्र ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करते हैं। ऐसे ईश्वर को जगन्नियन्ता मान कर लोगों ने उसे रिझाने के लिए हिंसा करना शुरू किया। इस हिंसा को रोकने के लिए भगवान महावीर ने कर्मवाद की स्थापना की। जो जैसा कर्म करता है उसे वैसा ही फल मिलता है। कुछ लोग वृक्ष आदि को निर्जीव मानते हैं और कुछ लोग पशु-पक्षियों को सजीव मान कर भी उनके साथ कठोर व्यवहार करते हैं। मानों उनमें जीव ही नहीं है। मनुष्य अधिकार के मद में दूसरों के साथ अनुचित व्यवहार करता है। इस विषम स्थिति को बदलने के लिए। भगवान् महावीर ने साम्यवाद का प्रचार किया। उन्होंने कहा कि सभी के व्यक्तित्व को Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.525039
Book TitleSramana 1999 10
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivprasad
PublisherParshvanath Vidhyashram Varanasi
Publication Year1999
Total Pages202
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Sramana, & India
File Size8 MB
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