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________________ ४८ : श्रमण/जनवरी-मार्च/१९९६ महासागर है। इन समस्या-सागरों के कारण ही व्यक्ति अपने मूल उद्देश्य से भटक जाता है और वृत्तियों के विभिन्न रूपों से प्रभावित होता रहता है, समस्याओं का निदान नहीं कर पाने के कारण विक्षिप्त होकर नाना प्रकार के दुःखों से पीड़ित होता रहता है। ध्यान के अभ्यास से व्यक्ति समस्याओं के मूल कारण को खोजने का प्रयत्न करता है। इससे चित्त धीरे-धीरे शान्त व निर्मल होता है, बुद्धि और विवेक जागृत होते हैं, जिससे वह किसी भी बात को गहराई से एवं स्पष्टता से पकड़ने लगता है। अतः ध्यानी के समक्ष जब भी कोई समस्या उपस्थित होती है तो उसका चित्त तुरन्त समस्या के वास्तविक कारण तक पहुँच जाता है और वास्तविक मूल कारण के प्राप्त हो जाने पर समस्या का निवारण सुगम हो जाता है। यह अवस्था कम से कम विक्षेपों के कारण ही सम्भव है। यही कारण है कि महर्षि पतञ्जलि' ने साधकों को वृत्तियों अथवा विकल्पों से मुक्त होने का निर्देश दिया है, क्योंकि विकल्परहित अवस्था ही ध्यान साधना का लक्ष्य है। आत्मा को पूर्वकृत कर्मों से उत्पन्न संस्कारों से मुक्त करने के लिए चित्त को विशुद्ध किया जाता है। पूर्वकृत कर्मों या संस्कारों के कारण व्यक्ति प्रमादी बन जाता है, निरन्तर इसी दिशा में चिन्तन करता रहता है कि कैसे उसे भौतिक सुखसाधन के सारे उपक्रम प्राप्त हो जाएँ। एक साधन की उपलब्धि होने पर दूसरे के लिए प्रयत्न प्रारम्भ कर देता है। किन्तु इस तरह उसके प्रयत्न अनन्तकाल तक चलते रहें तब भी उसकी आकांक्षाओं या इच्छाओं की पूर्ति सम्भव नहीं है। एक इच्छा या विकल्प उपस्थित हुआ उसका अभी समाधान भी नहीं हुआ कि दूसरा विकल्प उठ खड़ा हुआ। कभी-कभी परस्पर विरोधी विकल्पों या इच्छाओं से व्यक्ति के मन में संघर्ष का ऐसा वातावरण उपस्थित हो जाता है कि मनुष्य स्वयं से भागने लगता है, यह एक अत्यन्त दुःखद स्थिति है। ध्यान की साधना से व्यक्ति अप्रमत्त चेता हो जाता है। सांसारिक उपलब्धियों की नश्वरता को जानकर उनके प्रति उसका लगाव कम होने लगता है। व्यक्ति की विवेक शक्ति जग जाती है। वह नियंत्रित एवं संयमित जीवन जीने में विश्वास करने लग जाता है। उसका मन विकल्पों के द्वन्द्व में भटकना बन्द कर देता है। उसकी यह अवस्था ध्यान की साधना के लिए उपयुक्त भूमिका प्रस्तुत कर देती है, क्योंकि वह अपने मन को एक विचारबिन्दु पर स्थिर कर सकता है। जब किसी व्यक्ति का मन किसी एक वस्तु पर केन्द्रित हो जाता है तो वह ध्यान कहलाता है। आचार्य उमास्वाति तत्त्वार्थसूत्र में ध्यान की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि मन के चिन्तन का एक ही वस्तु पर अवस्थान या केन्द्रित करना ध्यान है। मानव मन बहुत अधिकं चंचल है। वह कभी भी एक स्थान पर नहीं टिक For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org Jain Education International
SR No.525025
Book TitleSramana 1996 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAshok Kumar Singh
PublisherParshvanath Vidhyashram Varanasi
Publication Year1996
Total Pages122
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Sramana, & India
File Size6 MB
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