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अर्ह परमात्मने नमः
प्रो० कल्याणमल लोढ़ा
'अहं परमात्मने नमः'---यह मंत्र आचार्य श्री कमलप्रभ के श्री जिनपंजरस्तोत्र से है। जैन दर्शन और साधना में अहं का महत्त्व सर्वमान्य है। बीजाक्षरी पद्धति से यह साधक के लिए सर्वोपरि और सर्वसम्मत है। सप्ताक्षरी व अनेक मन्त्र अहँ के ही मान्य मंत्र हैं। इस निबन्ध में हम प्रमुख रूप से कलिकालसर्वज्ञ श्री हेमचन्द्राचार्य के अनुसार ही इसकी विवेचना करेंगे। इस विवेचना के आधार हैं, उनके द्वारा रचित श्रीहेमचन्द्रशब्दानुशासनम्, योगशास्त्र व द्वयाश्रय महाकाव्य । इन तीन ग्रन्थों का आश्रय लेकर हम अर्ह सम्बन्धी उनकी व्याख्या को स्पष्टतः समझ सकते हैं ।
सर्वप्रथम शब्दानुशासनम् को ही लें, जिसकी स्वोपज्ञ तत्त्वप्रकाशिका टीका शब्दमहार्णवन्यास से संवलित है। अर्ह का स्वरूप स्पष्ट करते हुए आचार्य श्री कहते हैं—'अर्ह इत्येदक्षरम् । परमेश्वरस्य परमेष्ठिनो वाचकम् । सिद्ध चक्रस्या स्यादिबीजम् । सकलागमोपनिषद् भूतम् । अशेष विघ्न-विघातनिधन्मे। अखिल दृष्टादृष्ट फल संकल्प कल्प द्रमोपमम्, आशास्त्राध्ययना ध्यापनावधि प्रणिधेयम् प्रतिधानं चानेनात्मनः सर्वतः संभेदस्तदमिधेयेन चाभेदः । वयमपि चेताच्छास्त्रारम्भे प्रणिद्धमहे । अयमेव हि तात्विको नमस्कार इति ।' तत्त्वप्रकाशिका में इन पदों को स्वरूपम्, अभिधेयम् तात्पर्यम्, क्षेगम योगः प्रणिधानम् प्रणिधानस्य द्वैविध्यम् विशिष्ट प्रणिधानम् और तत्वम् के अधिकरण से व्याख्या की गयी है। इन सबके विशेषार्थ निमित्त शब्दमहार्णवन्यास द्रष्टव्य है । अहँ परमेश्वर परमेष्ठि का वाचक, सिद्ध चक्र का आदिबीज, सकल आगमों का रहस्य, सर्व विघ्ननाशक एवं सभी दृष्टअदृष्ट के फलों का संकल्प पूर्ण करने के लिए कल्पतरु सदृश है। शास्त्रानुशीलन के लिए इसका प्रणिधान आवश्यक है। प्रणिधान दो प्रकार का है-प्रथम परमेष्ठी के साथ आत्मा का अभेद एवं संभेद ।
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