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________________ एवमभ्याहते लोके सर्वतः परिवारिते । अमोघासु पतन्तीषु किं धीर इव भाषसे ।। -- शान्ति पर्व, २७७/७, (ख) केण अब्भाहओ लोगो ? केण वा परिवारिओ ? का वा अमोहा वुत्ता? जाया ! चिंतावरो हुमि -उत्तरा० १४।२२ कथमभ्याहतो लोक: केन वा परिवारितः । अमोघाः काः पतन्तीह किं नु भीषयसीव माम ।। -शान्ति पर्व, २७७१८ (ग) मच्चुणाडब्भाहओ लोगो जराए परिवारिओ। अमोहा रयणी वुत्ता एवं ताय ! वियाणह ।। -उत्तरा० १४।२३ मृत्युनाभ्याहतो लोको जरया परिवारितः । अहोरात्राः पतन्ती मे तच्च कस्मान्न बुद्धयसे ।। -शान्ति पर्व, २७७।९. अन्त में पुत्र संन्यास मार्ग का अनुसरण करता है। महाभारत के अनुसार अपना अन्तिम निर्णय सुनाते हुए पुत्र कहता है कि वह काम और क्रोध को त्यागकर अहिंसा धर्म का पालन करेगा तथा अमर की भाँति मृत्यु को दूर हटा देगा' । इसी प्रकार उत्तराध्ययन में भी पुत्र राग को दूर कर श्रद्धा युक्त मुनि धर्म स्वीकार करने का अपना निर्णय सुनाता है ताकि उसे पुनः इस संसार में जन्म न लेना पड़े अर्थात् वह अमर हो जाय । । पिता भी पुत्र के तर्कों से सहमत हो उनका अनुसरण करते हुए संन्यास मार्ग का पथिक बन जाता है। इसकी सूचना हमें महाभारत एवं उत्तराध्ययन दोनों से होती है। हमने देखा कि उत्तराध्ययन एवं शान्ति पर्व के इन दोनों अध्ययनों में कितनी अधिक समानता है। यही नहीं, इन दोनों ग्रन्थों में उक्त अध्ययनों के उत्तरवर्ती अध्ययनों में भी अद्भुत समानता दिखाई देती है। शान्ति पर्व के २७८वें अध्ययन में मुनि ( संन्यासी) के १. शान्ति पर्व, २७७।३० २. उत्तराध्ययन, १४/२८ ३. वही, १४॥३७; शान्तिपर्व, २७७।३९. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.525005
Book TitleSramana 1991 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAshok Kumar Singh
PublisherParshvanath Vidhyashram Varanasi
Publication Year1991
Total Pages112
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Sramana, & India
File Size5 MB
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