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( ८५ ) माहेश्वरी विद्या', बहुरूपिणी, स्तंभिनी, चक्रिणी, शूला, मोहिनी, भ्रामरी आदि का उल्लेख युद्ध वर्णनों में पाया जाता है। ___ पाण्डव पुराण में युद्ध वर्णनों का बाहुल्य है। कवि के युद्ध वर्णन का कौशल अद्वितीय है। युद्ध वर्णनों के पठन अथवा श्रवण मात्र से ही युद्ध की भीषणता का दृश्य आँखों के सामने उपस्थित हो जाता है । उदाहरणार्थ-अर्जुन के द्वारा गिराये हुये भग्न रथों से मार्ग रुक गया तथा जिनकी शुण्डायें टूट गयी हैं और जो दुःख से चिंघाड रहे हैं ऐसे हाथियों से मार्ग व्याप्त हुआ। रणभूमि में मस्तक रहित शरीर नृत्य करने लगे तथा उनके मस्तकों द्वारा भूमि लाल हो गयी। अगाध समुद्र में तैरने के लिये असमर्थ मनुष्य जैसे उसमें कहीं भी स्थिर नहीं होते वैसे ही योद्धाओं के रक्त के प्रवाह में तैरने वाले मानव कहीं भी नहीं ठहर सके।
युद्ध के प्रारम्भ में रण सूचक वाद्य बजाये जाते थे इनमें रणभेरी, पाञ्चजन्य शंख", देवदत्त शंख, दुन्दुभि , आदि का उल्लेख आया है। सैन्य में हये शकून तथा अपशकुन पर भी विचार करने का उल्लेख पाण्डव पुराण में आया है। मगधपति जरासन्ध के सैन्य में अनेकों दुनिमित्त हुये जो कि जय के अभाव को सूचित करते थे तब दुर्योधन ने अपने कुशल मन्त्री को बुलाकर इन सब दुनिमित्त के बारे में विचार किया था। न्याय तथा दण्ड व्यवस्था
न्याय तथा दण्ड व्यवस्था के बारे में पाण्डव पुराण में विशेष उल्लेख नही आया है एक स्थान पर केवल इतना कहा गया है कि
१. पाण्डव पुराण, २०१३०८ २. वही, २०१३३० ३. वही, २०।१११-११३ ४. वही, ३१८१, १९।३२ ५. वही, १९७७, २०।१६४ ६. वही, २१।१२७ ७. वही, १५।१२९ ८. वही, १९।८२-८५
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