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________________ ( ६७ ) तृत्व व एकस्वरूप विज्ञानघन से पथभ्रष्ट होकर आत्मा को कर्ता समझता है । आत्मा तो अनादिघन निरन्तर समस्त रसों से भिन्न अत्यंत मधुर एक चैतन्य रस से परिपूर्ण है । कषायों के साथ आत्मा का विकल्प अज्ञान से होता है, जिसे आत्मा व कषायों का भेदज्ञान हो जाता है, वह ज्ञानी आत्मा सम्पूर्ण कर्तृ भाव को त्याग देता है, वह नित्य उदासीन अवस्था को धारणकर केवल ज्ञायक रूप में स्थित रहता है और इसी से निर्विकल्पक अकृत, एक, विज्ञानघन होता हुआ अत्यन्त अकर्त्ताप्रतिभासता है ।" अज्ञानान्धकार से युक्त जो आत्मा को कर्ता मानते हैं, वे मोक्ष के इच्छुक होते हुए भी मोक्ष को प्राप्त नहीं होते । अतः निश्चयनय या पारमार्थिक दृष्टि से कुन्दकुन्द आत्मा में कर्तृत्व नहीं मानते, वह तो आस, अरूप, अगंध सब प्रकार के लिंग आवृत्ति से रहित, अशब्द, अशरीरी, ज्ञायक स्वभाव एवं शुद्ध है । आत्मा का भोक्तृत्व अभोक्तृत्व : आचार्य कुन्दकुन्द के अनुसार व्यवहार नय की अपेक्षा से आत्मा शुभ-अशुभ कर्मों का कर्ता एवं उनकर्मफलों का भोक्ता है । जिसप्रकार व्यावहारिक दृष्टि या व्यवहार नय से आत्मा पुद्गल कर्मों का कर्ता है उसी प्रकार वह पौद्गलिक कर्मजन्य फल सुख - दुःख एवं बाह्यपदार्थों का भोक्ता है । आत्मा जब तक प्रकृति के निमित्त से विभिन्न पर्याय रूप उत्पाद एवं व्यय का परित्याग नहीं करता तबतक वह मिथ्यादृष्टि व असंयमी रहकर सुखदुःख का उपभोग करता रहता है । अवधेय है कि जैनदर्शन में आत्मा के भोक्तृत्व को सांख्य की तरह उपचार से भोक्तृत्व नहीं कहा गया है । सांख्यवादी पुरुष को उपचार से कर्म - फलों का भोक्ता मानते हैं, आचार्य कुन्दकुन्द ऐसा न मानकर आत्मा को व्यावहारिक स्तर पर वास्तविक रूप से भोक्ता मानते हैं । " सांख्यों के उपचार से भोक्ता कहने का तात्पर्य यह है कि यद्यपि पुरुष भोक्ता १. एदेण दुसो कत्ता आदा णिच्छयबिइहिं परिकहदो । एवं खलु जो जाणदि सो मुचदि सव्बकत्तित्तं ।। समयसार - ९७ २. एतेन विशेषणाद- उपचरित वृत्या भोक्तारं चात्मानं मन्यमाना सांख्य:नाम् निरासः । षड्दर्शनसमुच्चय टीका- कारिका - ४९ । ३. पंचास्तिकाय तत्त्वदीपिका टीका- ६८, पुरुषार्थ सिद्धयुपाय - १० For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.525005
Book TitleSramana 1991 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAshok Kumar Singh
PublisherParshvanath Vidhyashram Varanasi
Publication Year1991
Total Pages112
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Sramana, & India
File Size5 MB
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