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( ६६ ) वस्तु के क्षणिक होने से, जो कर्ता है वही भोक्ता नहीं होगा क्योंकि वह तो उसी क्षण विनष्ट हो गया। इस प्रकार अन्य ही कर्ता और अन्य ही भोक्ता सिद्ध होगा जो कि प्रत्यक्ष विरुद्ध होने से मिथ्या है । कुंदकुंदाचार्य ने द्रव्य की पर्याय रूप अवस्थाओं को 'क्षणिक किंवा अनित्य' स्वीकार करके भी उन पर्यायों में सर्वदा विद्यमान रहने वाले गुण के कारण द्रव्य की नित्य सत्ता स्वीकार की है। यदि ऐसा माना जाय तो पर्यायाथिक दृष्टि से आत्मा में कर्तृत्व-भोक्तृत्व के समय अन्य पर्याय का कर्तृत्व एवं अन्य पर्याय का भोक्तृत्व सम्भव है जैसे मनुष्य पर्याय में किये गये शुभकर्मों का फल देव पर्याय में होगा किन्तु द्रव्याथिक दृष्टि से देखा जाय तो मोतियों की माला में अनुस्यूत सूत्र के समान समस्त पर्यायों में द्रव्य अनुस्यूत रहता है अतः वही नित्य द्रव्य कर्ता एवं भोक्ता है।'
आत्मा के अकर्तृत्व का प्रतिपादन करते हुए आचार्य कुन्दकुन्द ने कहा है कि निश्चय नय ( शुद्ध निश्चय ) से या पारमार्थिक दृष्टि से आत्मा को कर्ता मानना मिथ्या है, ऐसा मानने वाले अज्ञानी हैं। आत्मा किसी से उत्पन्न नहीं हुआ है इसलिए कार्य नहीं है और किसा को उत्पन्न नहीं करता इसलिए कारण भी नहीं है। कर्म की अपेक्षा कर्ता व कर्ता की अपेक्षा कर्म उत्पन्न होते हैं - ऐसा नियम है। कर्ता व कर्म अन्य की अपेक्षा सिद्ध न होकर स्वद्रव्य की अपेक्षा ही सिद्ध होते हैं, अतः आत्मा-अकर्ता है। आत्मा जो स्वभाव से शुद्ध तथा देदीप्यमान चैतन्यस्वरूप ज्योति के द्वारा जिसने संसार के विस्तार रूप भवन को प्राप्त कर लिया है-अकर्ता है । अतः शुद्धनिश्चय नय की दृष्टि से आत्मा अकर्ता है । आत्मा में कर्तृत्वपन पर और आत्मद्रव्य के एकत्वाध्यास से होता है । 'अज्ञानी जीव भेद संवेदन शक्ति के तिरोहित हो जाने के कारण आत्मा को कर्ता समझता है। वह पर और आत्मा को एकरूप समझता है, इसी मिश्रित ज्ञान से आत्मा के अक१. समयसार-३४५-३४८ २. अकर्ता जीवोऽयं स्थित इति विशुद्ध स्वरसतः समयसार-३११ अमृतचन्द
स्वामी कलश-१९४, ३. समयसार-३०८-३१० ४. वही, १९४
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