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आत्मा का कर्तृत्व-अकर्तृत्व :
न्याय-वैशेषिक, मीमांसा व वेदान्त की तरह जैन दार्शनिकों ने भी आत्मा को शुभ-अशुभ, द्रव्यभाव कर्मों का कर्त्ता व भोक्ता माना है । सांख्य दर्शन एक ऐसा दर्शन है जो आत्मा को कर्त्ता तो नहीं मानता पर भोक्ता मानता है । अन्य भारतीय दार्शनिकों की अपेक्षा जैन दार्शनिकों की यह विशेषता रही है कि वे अपने मूलभूत सिद्धान्त स्याद्वाद के अनुसार आत्मा को कथंचित् कर्ता व कथंचित् अकर्त्ता मानते हैं ।
जैन दर्शन की परम्परागत मान्यता के अनुरूप आचार्य कुन्दकुन्द भी आत्मा को कर्त्ता एवं भोक्ता निर्दिष्ट करते हैं । उन्होंने आत्मा के कर्तृत्व- भोक्तृत्व पर तीन दृष्टियों से विचार किया है - निश्चय नय, अशुद्ध निश्चय नय एवं व्यवहार नय । इन तीनों दृष्टियों से विचार करने पर आत्मा में कर्तृत्व-अकर्तृत्व एवं भोक्तृत्व अभोक्तृत्व दोनों परिलक्षित होता है । जिसे हम आने वाली पंक्तियों में देखेंगे ।
कुन्दकुन्दाचार्य के अनुसार आत्मा को कर्त्ता कहने का तात्पर्य यह है कि वह परिणमनशील है । 'यः परिणमति सः कर्ता' " अन्य द्रव्यों की भाँति आत्मा में भी स्वभाव व विभाव दो पर्याय माने गये हैं । अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त सुख तथा अनन्त वीर्य ये आत्मा के स्वभाव गुण पर्याय हैं । पुद्गल या पुद्गलकर्मों के संयोग के कारण आत्मा में होने वाले पर्याय विभाव पर्याय कहलाते हैं जैसेमनुष्य, नारकीय, तिर्यञ्च आदि गतियों में आत्मप्रदेशों का एकाकार होना विभाव पर्याय है । चूंकि व्यवहार व अशुद्ध नय की अपेक्षा ही आचार्य कुंदकुंद आत्मा में कर्तृत्व मानते हैं इसलिये उनके अनुसार व्यवहार नय की अपेक्षा आत्मा द्रव्यकर्म, नोकर्म एवं घटपटादि कर्मों का कर्ता है और अशुद्ध निश्चय नय की अपेक्षा से भावकर्मों का कर्ता है । समयसार में आचार्य ने कहा है कि व्यवहार नय से आत्मा घट, पट, रथ आदि कार्यों को करता है, स्पर्शनादि पंचेन्द्रियों को करता है ज्ञानावरणादि द्रव्य कर्मों तथा क्रोधादि भावकर्मों को करता है ।' व्यवहार नय से जीव ज्ञानावरणादि कर्मों, औदारिकादि शरीर एवं
२. समयसार आत्मख्याति टीका गाथा ८६, कलश- ५१
३. समयसार -९६
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