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जैनविद्या - 20-21
उत्तर : यह कथन भी अयुक्त है, क्योंकि प्रधान परमात्मा के समान नित्य, निष्क्रिय, अनन्त आदि अविशेषपने से परमात्मा का आविर्भाव और तिरोभाव नहीं होने से उसमें परिणमन का अभाव है, उसी प्रकार आत्मा के समान अविशेष रूप से नित्य, निष्क्रिय और अनन्त होने से प्रधान के भी विकार का अभाव है और प्रधान के विकार का अभाव होने से प्रधान का विकार आकाश है' - इस कल्पना का व्याघात होता है । अथवा जैसे प्रधान के विकार घट के अनित्यत्व, अमूर्तत्व और असर्वगतत्व है, उसी प्रधान का विकार होने से आकाश के भी अनित्यत्व, अमूर्तत्व और असर्वगतत्व होना चाहिए या फिर आकाश की तरह घट के भी नित्यत्व, अमूर्तत्व और सर्वगतत्व होना चाहिए, क्योंकि एक कारण से दो परस्पर अत्यन्त विरोधी कार्य नहीं हो सकते।" . छठे अध्याय के दसवें सूत्र की व्याख्या में कहा गया है कि कारण तुल्य होने से कार्य तुल्य होना चाहिए, इस पक्ष में प्रत्यक्ष और आगम से विरोध आता है। मिट्टी के पिण्ड से घट, घटी, शराब, उदन्चन आदि अनेक कार्य होने से उपर्युक्त सिद्धान्त से प्रत्यक्ष विरोध आता है। सांख्य एक प्रधान तुल्य कारण से महान् अहंकार आदि नाना कार्य मानते हैं। ... वस्तुओं में भिन्न-भिन्न स्वभाव स्वीकार किए जाने में सांख्य का भी उदाहरण दिया गया है, जहाँ सत्व, रज, तम गुणों का प्रकाश, प्रवृत्ति और नियम आदि स्वभाव माना गया है।
योग दर्शन-समीक्षा - मोक्ष के कारणों के विषय में विभिन्न वादियों के मत वैभिन्न को दिखलाते हुए योगदर्शन की मान्यता की ओर निर्देश किया गया है, जिसके अनुसार ज्ञान और वैराग्य से मोक्ष होता है । पदार्थों के अवबोध को ज्ञान कहते हैं और विषयसुख की अभिलाषाओं के त्याग अर्थात् पंचेन्द्रियजन्य विषयसुखों में अनासक्ति को वैराग्य कहते हैं ।
वेद-समीक्षा - प्रथम अध्याय के दूसरे सूत्र की व्याख्या में 'पुरुष एवेदं सर्वम्' इत्यादि ऋग्वेद के पुरुष-सूक्त की पंक्ति उद्धृत करते हुए कहा गया है कि ऋग्वेद में पुरुष ही सर्व है, वही तत्व है, उसका श्रद्धान सम्यग्दर्शन है; यह कहना उचित नहीं है, क्योंकि अद्वैतवाद में क्रिया-कारक आदि समस्त भेद-व्यवहार का लोप हो जाता है।
__ आठवें अध्याय के प्रथम सूत्र की व्याख्या में वादरायण, वसु, जैमिनी आदि श्रुतविहित क्रियाओं का अनुष्ठान करनेवालों को अज्ञानी कहा है, क्योंकि इन्होंने प्राणिवध को धर्म का साधन माना है। समस्त प्राणियों के हित के अनुशासन में जो प्रवृत्ति कराता है, वही आगम हो सकता है, हिंसाविधायी वचनों का कथन करनेवाले आगम नहीं हो सकते, जैसे दस्युजनों के वचन। अनवस्थान होने से भी ये आगम नहीं है अर्थात् कहीं हिंसा और कहीं अहिंसा का परस्पर विरोधी कथन इनमें मिलता है। जैसे पुनर्वसु पहला है, पुष्प पहला है, ये परस्पर विरोधी वचन होने से अनवस्थित एवं अप्रमाण हैं। उसी प्रकार वेद में भी कहीं पर पशुवध को धर्म का हेतु कहा है - जैसे एक स्थान पर लिखा है कि पशुवध से सर्व इष्ट पदार्थ मिलते हैं, यज्ञ विभूति के लिए है, अतः यज्ञ में होनेवाला वध अवध है। दूसरी जगह लिखा है कि 'अज' जिनमें अंकुर उत्पन्न होने की शक्ति न हो, ऐसे तीन वर्ष पुराने बीज से पिष्टमय बलिपशु बनाकर यज्ञ करना चाहिए, इस प्रकार हिंसा का खण्डन किया गया है । इस प्रकार ये वचन परस्पर विरोधी हैं, अतः अव्यवस्थित तथा विरोधी होने से वेदवाक्य प्रमाण नहीं हो सकते।" इस तरह वेदवाक्य की प्रमाणता का तत्वार्थवार्तिक में विस्तृत खण्डन किया गया है।