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________________ जैनविद्या - 20-21 अकलंकदेव ने नैगमनय को अर्थ की परिधि में लाकर उसका लक्षण इस प्रकार किया है अन्योन्यगुणभूतैकभेदाभेदप्ररूपणात्। नैगमोऽर्थान्तरत्वोक्तौ नैगमाभास इष्यते॥10॥ (नयप्रवेश) अर्थात्, नैगमनय गुण-गुणी या धर्म-धर्मी में किसी एक को गौणता से तथा दूसरे को मुख्यता से ग्रहण करता है, जैसे जीव के स्वरूप-निरूपण में उसके ज्ञान आदि गुण गौण हो जाते हैं और ज्ञान आदि गुणों के वर्णन में जीव गौण हो जाता है। परन्तु, गुण-गुणी, अवयव-अवयवी, क्रियाक्रियावान तथा सामान्य-विशेष में सर्वथा भेद मानना नैगमनयाभास है। संग्रहनय के सन्दर्भ में अकलंकदेव कहते हैं कि बौद्ध सर्वथा भेदात्मक स्वलक्षण का जैसा वर्णन करते हैं, वैसा क्षणिक पदार्थ न तो किसी ज्ञान का विषय ही हो सकता है, न ही वह किसी अर्थक्रिया में सक्षम हो सकता है । क्षणिक पदार्थ में कार्यकारण भाव के अभाव से जब अर्थक्रिया ही नहीं बनती, तब उसकी सत्ता की आशा करना मृगमरीचिका के पीछे दौड़ने के समान है। अकलंकदेव के मतानुसार, संग्रहनय अभेददृष्टि से पदार्थों का संग्रह करनेवाला है। इस नय में शुद्ध सन्मात्र विषय होने पर भी भेद का निराकरण नहीं है, किन्तु भेद अवश्य ही गौण हो जाता है। भेद का निराकरण करने पर संग्रहनय संग्रहनयाभास हो जाता है। इस सन्दर्भ में अकलंक की, बौद्धों के क्षणिक एकान्त के निरसन से सम्बद्ध मूल कारिकाएँ इस प्रकार हैं लक्षणं क्षणिकैकान्ते नार्थस्यार्थक्रिया सति। कारणे कार्यभावश्चेत् कार्यकारणलक्षणम्॥6॥ कार्योत्पत्तिविरुद्धा चेत् स्वयं कारणसत्तया। युज्येत क्षणिकेऽर्थेऽर्थक्रिया सम्भवसाधनम्॥7॥ सङ्ग्रहः सर्वभेदैक्यमभिप्रैति सदात्मना। ब्रह्मवादस्तदा भासः स्वार्थभेद निराकृतेः॥9॥ (नयप्रवेश) संग्रहनय के द्वारा गृहीत अर्थ में विधिपूर्वक अविसंवादी वस्तुस्थितिमूलक भेद करनेवाला नय व्यवहारनय है। यह नय लोकप्रसिद्ध व्यवहार का अविरोधी होता है। जिस अभेद व्यवहार में भेद की अपेक्षा रहती है वह व्यवहारनय की परिधि में आता है, किन्तु अभेद के निराकरण की स्थिति में वह व्यवहारनयाभास हो जाता है। इस सन्दर्भ में आचार्य अकलंकदेव की मूल कारिका है - व्यवहाराविसंवादी नयः स्याद् दुर्नयोऽन्यथा। बहिरर्थोऽस्ति विज्ञप्तिमात्रं शून्यमितीदृशः॥13॥ (नयप्रवेश) इस कारिका की स्वोपज्ञवृत्ति में अकलंकदेव ने स्पष्टं किया है कि लोक-व्यवहार अर्थ, शब्द तथा ज्ञान से संचालित होता है। जैसे जीव-व्यवहार, जीव अर्थ, जीव शब्द तथा जीवविषयक ज्ञान, इन तीनों प्रकारों से हो सकता है। वस्तु उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यात्मक है', 'द्रव्य गुण-पर्यायात्मक है', 'जीव चैतन्यरूप है' इत्यादि वाक्य, प्रमाण से अविरोधी होने तथा लोक-व्यवहार में
SR No.524767
Book TitleJain Vidya 20 21
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1999
Total Pages124
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size9 MB
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