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जैनविद्या - 20-21
समय-निर्धारण
अकलंकदेव के काल के सम्बन्ध में कई धारणाएँ प्रचलित हैं। अकलंक चरित्र में निम्न श्लोक आया है जिसमें उनके द्वारा विक्रम सम्वत् 700 अर्थात् ई. सन् 643 में शास्त्रार्थ करने का उल्लेख है ।
शत सप्त
प्रभाजुषि ।
विक्रमार्क शकाब्दीय काले अकलंक यति नो बौद्धैर्वादो महान भूत ॥
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इस श्लोक में विक्रमार्क पद का अर्थ कुछ विद्वानों ने शक सम्वत् किया है। दोनों में 135 वर्ष का अंतर
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स्व. डॉ. महेन्द्रकुमार न्यायाचार्य ने दोनों मतों के विद्वानों की धारणाओं को दृष्टिगत कर अकलंक का समय ई. सन् 8वीं शती सिद्ध किया है। डॉ. श्री नेमिचन्द शास्त्री ज्योतिषाचार्य के मतानुसार- " आचार्य कैलाशचन्द्र शास्त्री ने गहन अध्ययन कर अकलंकदेव का समय ई. सन् 620-680 निश्चित किया है और महेन्द्रकुमारजी के अनुसार यह समय ई. सन् 720-780 . आता है। इस तरह दोनों समयों के मध्य 100 वर्ष का अंतर है।"
यह उल्लेखनीय है कि अकलंकदेव धनंजय के पूर्ववर्ती हैं और धनंजय वीरसेन के पूर्ववर्ती हैं किन्तु डॉ. महेन्द्रकुमारजी इन तीनों को समकालीन मानते हैं। समय-भेद का मूल कारण यही है । फिर भी, सुविचारित दृष्टि से अकलंकदेव का काल ई. सन् 620-680 अधिक प्रमाणिक प्रतीत होता है। इसकी पुष्टि उक्त श्लोक से होती है।
कर्त्तृत्व
अकलंकदेव दर्शन शास्त्र के गूढ़ अध्येता थे । उन्होंने षट्दर्शन का गम्भीर अध्ययन-चिंतन कर तर्क और युक्ति से जैन दर्शन की श्रेष्ठता, समीचीनता और आत्मकल्याण हेतु उसकी उपादेयता सशक्त रूप से सिद्ध की। यद्यपि वे मूलत: तार्किक - दार्शनिक थे फिर भी उन्हें जैन सिद्धान्त न्याय और आगम पर पूर्ण अधिकार था। जैन अध्यात्म पक्ष उनके चिंतन का केन्द्रबिन्दु था। उनकी रचनाएँ गूढ़-गम्भीर हैं। उन्हें संस्कृत भाषा पर पूर्ण अधिकार था । उन्होंने गद्य और पद्य दोनों में रचना की । गहन विषयों को सहज-सरल करने हेतु उन्होंने व्यंगात्मक शैली भी अपनायी । उनकी भाषा छन्द, अलंकार, व्याकरण, शब्द सार्मथ्य आदि अद्भुत थी। वे वार्तिककार के साथ ही सफल व्याख्या - भाष्यकार भी थे ।
अकलंकदेव की रचनाएँ दो भागों में विभक्त हैं- प्रथम भाग में टीका ग्रन्थ हैं और द्वितीय भाग में जैन- न्याय विषयक स्वतंत्र रचनाएँ हैं । इनका विवरण इस प्रकार है
टीका ग्रंथ
1. तत्त्वार्थवार्तिक भाष्य (तत्त्वार्थराजवार्तिक)
2. अष्टशती - देवागम विवृत्ति