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जैनविद्या - 20-21
ध्यान
आरौिद्रधर्म्यशुक्लानि। ऋतमर्दनमात्तिर्वा तत्र भवमार्त्तम् ॥1॥ ऋतं दुःखम् अथवा अर्दनमार्तिर्वा, तत्र भवमार्त्तम्।
रुद्रःक्रूरस्तत्कर्म रौद्रम्॥2॥ रोदयतीति रुद्रः क्रूर इत्यर्थः, तस्येदं कर्म तत्र भवं वा रौद्रमित्युच्यते।
धर्मादनपेतं धर्म्यम्॥3॥ धर्मो वर्णितः ततोऽनपेतं ध्यानं धर्म्यमित्याख्यायते।
शुचिगुणयोगाच्छुक्लम्॥4॥ यथा मलद्रव्यापायात् शुचिगुणयोगाच्छुक्ल वस्त्रं तथा तद्गुणसाधादात्म-परिणामस्वरूपमपि शुक्लमिति निरुच्यते।
तत्त्वार्थराजवार्तिक, 9.28 ध्यान चार प्रकार का है - आर्त, रौद्र, धर्म्य और शुक्ल। ऋत-दुःख अथवा अर्दन-आर्ति इनसे होनेवाला ध्यान आर्तध्यान है। 1।
रुलानेवाले को रुद्र-क्रूर कहते हैं, रुद्र का कर्म या रुद्र में होनेवाला ध्यान रौद्रध्यान है। 2।
धर्मयुक्त ध्यान धर्म्यध्यान है। 3 ।
जैसे मैल हट जाने से वस्त्र शुचि होकर शुक्ल कहलाता है उसी तरह निर्मलगुणरूप आत्मपरिणति भी शुक्ल है। 4।
(इनमें आदि के दो ध्यान अपुण्यास्रव के कारण होने से अप्रशस्त हैं और शेष दो कर्म-निर्दहन में समर्थ होने से प्रशस्त हैं।
अनु. - प्रो. महेन्द्रकुमार जैन, न्यायाचार्य