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जैनविद्या - 20-21
7. विद्यानन्दि स्वामी (लगभग 775-825 ई.) अकलंक के अनन्य भक्त एवं अन्यतम
टीकाकार हैं। इनके प्रायः समस्त ग्रन्थों पर अकलंक के चिन्तन की छाप परिलक्षित होती है। स्वामी समन्तभद्र की 'आप्तमीमांसा' पर अकलंक ने 'अष्टशती' रची थी और विद्यानन्दि स्वामी ने 'अष्टसहस्री' के नाम से उसकी और विशद व्याख्या प्रस्तुत की। हरिवंशपुराण (783 ई.) के प्रारम्भ में पुन्नाटसंघी जिनसेन सूरि ने समन्तभद्र और सिद्धसेन के उपरान्त अनेक व्याकरणों के ज्ञाता 'देवसंघ के देव' का सादर स्मरण किया है
इन्द्र चन्द्रार्क जैनेन्द्रव्याडि व्याकरणेक्षिणः।
देवस्य देवसंघस्य न बन्धतेगिरिः कथ्म॥ विद्वानों का अनुमान है कि यहाँ 'देव' से अकलङ्कदेव का अभिप्राय है। 9. 9वीं शती ईस्वी में हुए रविभद्रपादोंपजीवि अनन्तवीर्य भी अकलंक के अन्यतम टीकाकार
और अनन्य भक्तों में रहे। उन्होंने भी मात्र 'देव' नाम से अकलंक का उल्लेख किया है। 10. आदिपुराणकार जिनसेनस्वामी (लगभग 790-850 ई.) ने अपने पुराण में श्रीपाल और
पात्रकेसरि के साथ-साथ भट्टाकलंक के अति निर्मल गुणों को विद्वानों के हृदय पर
सुशोभित होनेवाली मणिमाला की संज्ञा दी है। 11. सोमदेव सूरि (लगभग 945-975 ई.) ने अपने नीतिवाक्यामृत' में अकलंक का निम्नवत स्मरण किया हैसकल
समयतर्केनाकलंकोऽसिवादिन, न भवसिसमयोक्तो हंससिद्धान्तदेवः। न च वचनविलासे पूज्यपादोऽसित्वं,
वदसि कथं इदानीं सोगदेवेन साधम् ॥ अकलंक की भाँति सोमदेव भी देवसंघ के ही आचार्य थे और उन्हीं के अनुयायी वादी (शास्त्रार्थी) गुरुओं की परम्परा में उत्पन्न एक महान शास्त्रार्थी थे। उनके द्वारा अकलंक
की 'न्यायविनिश्चय' की टीका भी लिखी बताई जाती है। 12. इन्हीं के समकालीन अपभ्रंश कवि पुष्पदन्त ने भी अपने 'महापुराण' में अकलंक का
स्मरण किया है। 13. महापण्डित माणिक्यनन्दि (लगभग 965-1000 ई.) ने अपना परीक्षामुखसूत्र' अकलंक
के वचन-समुद्र का मंथन करके बनाया है। इस सूत्र-ग्रन्थ में अकलंक के प्रति व्यक्त इनकी भक्ति को देखकर विद्वानों को यह भ्रम हो गया था कि यह अकलंक के साक्षात् शिष्य रहे हों।