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जैनविद्या - 20-21
ब्रह्म नेमिदत्त के कथाकोश के अनुसार जब अकलंक और नि:कलंक बौद्ध दर्शन के अध्ययनार्थ किसी बौद्ध मठ में गये, उन दिनों जैनों और बौद्धों में परस्पर तीव्र मनोमालिन्य रहता था, अतः बौद्ध मठ में दाखिल होना सरल काम न था, फिर भी वे अपनी प्रतिभा के बल पर वहाँ प्रवेश पा गये। एक दिन बौद्ध गुरु दिङ्नाग के अनेकान्त-खण्डन का पाठ पढ़ा रहे थे पर पूर्वपक्ष का पाठ कुछ दुरूह अथवा अशुद्ध था, जिससे बौद्ध गुरु दिग्भ्रान्त हो गये और पाठ को अगले दिन के लिए स्थगित कर दिया। स्वामी अकलंकदेव उसे सरलता से समझ गये और रात्रि को उठकर उन्होंने उस पाठ को संशोधित कर दिया। जब बौद्ध गुरु ने अगले दिन संशोधित पाठ देखा तो वे समझ गये कि यहाँ कोई जैन विद्वान गुप्तरूप से अध्ययन कर रहा है, उन्हें भय हो गया, अतः तलाश करने के लिए जैनमूर्ति को लाँघने का कार्यक्रम रखा गया। दोनों भाई मूर्ति पर होशियारी और चतुराई से धागा डालकर जैनमूर्ति लाँघ गये और कुछ भी पता नहीं चला। अब तो मठ के सभी अधिकारीगण और विद्वान् चिन्तित और व्याकुल हो उठे। खिसियाकर उन्होंने रात को जब सभी छात्र गहरी निद्रा में सो रहे थे तो सहसा काँसे के बर्तनों की बोरी जीने से नीचे लुढ़का दी जिससे सभी छात्र भयभीत हो अपने-अपने इष्टदेव का पुण्य स्मरण करने लगे। ये दोनों भाई णमोकार मंत्र का जाप करते हुए पकड़े गये और उन्हें मठ की दूसरी मंजिल में बंद कर दिया गया, पर दोनों भाई छतरी के सहारे ऊपर से कूदकर भाग निकले। जब दूसरे दिन दोनों भाई नहीं मिले तो उन्हें ढूँढने के लिए सिपाही भेजे गये। सिपाही उन्हें ढूँढ़ते हुए एक नदी तट पर आये जहाँ एक धोबी वस्त्र धो रहा था। उधर दोनों भाइयों में विवाद चल रहा था कि तुम छिप जाओ, दूसरा कहता तुम छिप जाओ, समय अधिक था नहीं, अत: अकलंक ही नदी में छिप गये और सिपाहियों ने दोनों (धोबी और नि:कलंक) को तलवार के घाट उतार दिया।
सिपाहियों के चले जाने पर अकलंक नदी से बाहर निकले और कलिंग देश के रत्नसंचयपुर नगर में पधारे। वहाँ राजा हिमशीतल का राज्य था, उनकी रानी मदनसुन्दरी जैन धर्मावलंबिनी थी। आष्टाह्निका पर्व के दिन थे, रानी मदनसुन्दरी जैन रथयात्रा निकलवाना चाहती थी, पर बौद्धगुरु के बहकाने में आकर राजा हिमशीतल ने जैन रथयात्रा निकलवाने की अनुमति नहीं दी और शर्त लगा दी कि यदि कोई जैनगुरु बौद्धगुरु को शास्त्रार्थ में हरा दे तो रथयात्रा निकल सकती है। इससे रानी मदनसुन्दरी बहुत चिन्तित हुई और धर्मोपासना में और अधिक विशेषरूप से तल्लीन हो गई। सहसा अकलंकदेव राजा हिमशीतल की सभा में पधारे और बौद्धगुरु से शास्त्रार्थ के लिए तैयार हो गये। संघश्री परदा डालकर परदे के पीछे से शास्त्रार्थ कर रहा था, इस तरह शास्त्रार्थ करते हुए छ: माह बीत गए पर कोई निष्कर्ष न निकला। एक रात्रि को चन्द्रेश्वरी देवी ने अकलंक को रहस्य बताया कि परदे के पीछे घट में स्थित तारादेवी शास्त्रार्थ कर रही है, गुरु संघश्री नहीं, अतः प्रात: तुम किसी भी प्रश्न या उत्तर की पुनरावृत्ति के लिए कहना, बस इसी से उसकी पराजय हो जावेगी। चन्द्रेश्वरी देवी के परामर्श अनुसार अगले दिन अकलंकदेव ने वैसा ही किया और पुनरावृत्ति के लिए कहा पर कोई उत्तर न मिला तब तो अकलंकदेव ने परदे को हटाकर के तत्रस्थित घड़े को पैर की ठोकर से तोड़ दिया। निम्न पद्य प्रमाणरूप में प्रस्तुत है