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________________ 106 जैनविद्या - 20-21 भी गुण का अभाव हो तो आत्मा का सद्भाव भी नहीं रहेगा। जैसे - यदि आत्मा में वीर्य गुण नहीं हो तो उसमें सक्रियता और इसलिये जानने-देखने हेतु प्रयत्नपूर्वक व्यापाररूप उपयोगात्मकता का अभाव हो जायेगा। ऐसी स्थिति में जब ज्ञान-दर्शन ही नहीं रहेंगे तो परिणामी नित्यतारूप द्रव्यत्व, सामान्यविशेषात्मकतारूप वस्तुत्व किसका होगा? इस प्रकार आत्मा का अस्तित्व गुण अन्य द्रव्यों से भिन्न एक विशिष्ट प्रकार का अस्तित्व है। उसके अस्तित्व गुण का विशिष्ट स्वरूप सम्पूर्ण आत्मा अर्थात् आत्मा के समस्त गुण हैं । इसी प्रकार द्रव्यत्व, वस्तुत्व, प्रमेयत्व, ज्ञान, दर्शन, वीर्य आदि समस्त गुणों का विशिष्ट स्वरूप उनका आश्रयभूत सम्पूर्ण द्रव्य है । एक द्रव्य के समस्त गुणों के परस्पर एक-दूसरे का स्वरूप होते हुए एक द्रव्यरूपता को प्राप्त होने तथा सम्पूर्ण द्रव्य के एकानेकात्मक, भेदाभेदात्मक स्वरूपमय होने के कारण एक द्रव्य के प्रत्येक गुण का विशेषण उस द्रव्य के अन्य समस्त गुण होते हैं । इसलिये एक द्रव्य के कुछ गुणों का ज्ञान उस द्रव्य का ही नहीं उसके ज्ञात गुणों का भी आंशिक ज्ञान है। जब द्रव्य का कोई नवीन गुण ज्ञात होता है तो वह द्रव्य के ज्ञान में ही वृद्धि नहीं करता बल्कि द्रव्य के पूर्व ज्ञात गुणों का भी विशेषण होता हुआ, उनके ज्ञान को अधिक और परिष्कृत करता हुआ, भेदाभेदात्मक रूप से ज्ञात होता है। प्रत्यक्ष द्वारा एक समय में एक वस्तु के जितने भी गुण ज्ञात होते हैं वे परस्पर धर्मधात्मक स्वरूप में ही ज्ञात होते हैं, लेकिन भाषा के प्रयोगपूर्वक होनेवाले ज्ञान में गुण को गुणी से पृथक् करके जाना जाता है जो स्याद्वादनय संस्कृत रूप से वस्तु को ग्रहण करने पर ही यथार्थ हो सकता है। अकलंकदेव कहते हैं श्रुतज्ञान के स्याद्वाद और नयरूप दो उपयोग हैं, स्याद्वाद सकलादेशी और इसलिये प्रमाण ज्ञान है तथा नय विकलादेशी या वस्तु का आंशिक ज्ञान है। प्रमाण द्वारा प्रकाशित वस्तु के एकांश को जाननेवाला ज्ञान नय कहलाता है। स्याद्वाद प्रमाणात्मक होता है तथा स्याद्वाद से प्रभिव्यक्त अर्थात् विशेषित वस्तु के विशेष अंश का व्यंजक या प्ररूपक ज्ञान नय कहलाता है।" प्रत्येक नय-वाक्य के पूर्व वस्तु के अनेकात्मक स्वरूप के द्योतक 'स्यात्' शब्द का होना आवश्यक है। इस पद के द्वारा सामान्य रूप से वस्तु के द्रव्यपर्यायात्मक स्वरूप के ग्रहणपूर्वक उसके एक अंश को विशेषरूप से जाननेवाला नयात्मक ज्ञान ही यथार्थ हो सकता है। इस प्रकार श्रुतज्ञान द्वारा भी पदार्थ स्याद्वादनय संस्कृत रूप से ग्रहण किये जाने पर धर्मधात्मक या द्रव्यपर्यायात्मक स्वरूप में ज्ञात होता है। "जो भी ज्ञेय है वह अनन्तधर्मात्मक है" इस व्याप्ति में व्यभिचार दोष का निराकरण करते हुए अन्त में आचार्य विद्यानन्दि कहते हैं कि जीवादि धर्मी से अलग किया गया प्रमेयत्व धर्म नय-ज्ञान का विषय है तथा नय-ज्ञान के प्रमाणांश होने के कारण इस ज्ञान के विषय के रूप में वह स्वयं प्रमेय या अप्रमेय न होकर प्रमेयांश है। अतः नय-ज्ञान के विषय के रूप में वह स्वयं की अनन्तधर्मात्मकता को सिद्ध न करके जीवादि धर्मी की अनन्तधर्मात्मकता को ही सिद्ध करता है। लेकिन यही हेतु स्वयं प्रमाण ज्ञान के विषय के रूप में जीवादि धर्मी की ही नहीं स्वयं की अनन्तधर्मात्मकता को भी सिद्ध करता है।"
SR No.524767
Book TitleJain Vidya 20 21
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1999
Total Pages124
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size9 MB
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