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"विशुद्ध परिणाम तथा संक्लेश परिणाम के कारण अपने तथा दूसरे को दिये जानेवाले सुख-दुःख ही पुण्यास्रव तथा पापास्रव के कारण होते हैं। परिणामों में विशुद्धि तथा संक्लेश नहीं होने पर अपने अथवा दूसरों को सुख तथा दुःख होने पर भी पुण्यास्रव अथवा पापास्रव नहीं होते।"
"जैन न्यायशास्त्र को जो योगदान अकलंकदेव ने दिया है वह अपना उदाहरण आप है। उन जैसा तार्किक शायद ही जैन न्याय के इतिहास में कोई हो । उनके द्वारा दी गई प्रमाण-व्यवस्था को आचार्यों ने अपनी-अपनी प्रमाण-मीमांसा विषयक कृतियों में बिना किसी हेर-फेर के स्वीकार किया है।"
"अकलंकदेव की निर्विवाद विद्वता, तार्किकता और न्यायशास्त्र विशेषतः जैन न्याय में अप्रतिम अवदान के कारण परवर्ती आचार्यों ने उनका उल्लेख बड़े ही सम्मान के साथ किया है, साथ ही अनेक उपाधियों से भी इन्हें अलंकृत किया है। विशेषतः दक्षिण भारत के कर्नाटक प्रदेश में स्थित अनेक मन्दिरों-बस्तियों में उत्कीर्ण विभिन्न शिलालेखों में अकलंक का नाम भगवान महावीर की विश्रुत परम्परा में गौरव के साथ लिया गया है।"
"जैन न्याय को उनका अवदान अप्रतिम है।"
"जैन साहित्य के इतिहास में अकलंकदेव वे युगप्रवर्तक आचार्य हैं जिन्होंने ज्ञानमीमांसा का सुव्यवस्थित और सर्वांगीण विकास किया है।"
'जैनविद्या' पत्रिका का यह 20-21वाँ अंक 'अकलंक विशेषांक' के रूप में प्रकाशित है। हम उन विद्वान लेखकों के आभारी हैं जिनकी रचनाओं से इस अंक का कलेवर बनाया गया।
संस्थान समिति सहयोगी सम्पादक, सम्पादक मण्डल एवं सहयोगी कार्यकर्ताओं के प्रति आभारी हैं। मुद्रण हेतु जयपुर प्रिन्टर्स प्रा. लि. धन्यवादाह है।
डॉ. कमलचन्द सोगाणी