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________________ जैनविद्या - 20-21 - इसी भाव को आचार्य कुन्दकुन्द ने भी पंचास्तिकाय में व्यक्त किया है। वे कहते हैं . सुपरिणामो पुणं असुहो पावं ति हवदि जीवस्स । पोग्गलमेत्तो भावो कम्मत्तणं पत्तो ।० दोहं जीव के सत्क्रियारूप शुभ परिणाम भावपुण्य हैं और अशुभ परिणाम भावपाप हैं। इन भावपुण्य और भावपाप का निमित्त पाकर पुद्गल वर्गणाएँ ज्ञानावरणादि पुण्य और पापकर्मरूप परिणत होती हैं । पुण्यास्रव और पापास्रव किन परिणामों से होते हैं, इसे स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं रागो जस्स पसत्थो अणुकंपासंसिदो य परिणामो । चित्तम्हि णत्थि कलुषं पुण्णं जीवस्स आसवादि । " चरियापमादबहुलां कालुस्सं लोलदा या परपरितावपवादो पावस्स य आसवं 95 जिसके प्रशस्त राग है, दयायुक्त परिणाम हैं, चित्त में कलुषता नहीं है; उस जीव के पुण्य कर्म का आस्रव होता है । और विसएसु । कुणदि ॥2 - जिसके कार्य प्रमाद सहित होते हैं, चित्त में कलुषता होती है, विषयों की लोलुपता होती है, दूसरों को कष्ट देने के भाव होते हैं; उसके पापकर्म का आस्रव होता है । पुण्य प्रकृतियाँ 42 और पाप प्रकृतियाँ 82 हैं । अकलंकदेव तत्त्वार्थवार्तिक में कहते हैं शुभास्त्रिविधम्। तिर्यगायुः मनुष्यायुः, देवायुः । शुभनाम सप्तत्रिंशद्विकल्पम्। तद्यथा मनुष्यगतिः, देवगतिः, पंचेन्द्रिय जातिः, पंच शरीराणि, त्रीण्यंगोपांगानि, समचतुस्रसंस्थानम्, वज्रवृषभनाराचसंहननम्, प्रशस्त वर्णगन्धरसस्पर्शाः, मनुष्यगतिदेवगत्यानुपूर्व्यद्वयम्, अगुरुलघु, परघातोच्छ्वासाऽतपोद्योतप्रशस्तविहायोगतयः त्रसबादरपर्याप्तिप्रत्येकशरीरस्थिरशुभसुभगसुस्वर, आदेय यशःकीर्तयः निर्माणं, तीर्थंकर नाम चेति । शुभमेकमुच्चर्गोत्रम् । सद्वेद्यमित्येता द्वाचत्वारिंशत्प्रकृतयः पुण्यसंज्ञा इति । 13 " आदेय, यशः कीर्तयः तिर्यंच आयु, मनुष्य आयु और देवायु- तीन आयु, मनुष्यगतिदेवगति-पंचेन्द्रिय जाति, पाँच शरीर, तीन अंगोपांग, समचतुस्र संस्थान, वज्रवृषभनाराच संहनन, प्रशस्त वर्ण-गन्ध-रस और स्पर्श, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, देवगत्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, परघात, उच्छ्वास, आतप, उद्योत, प्रशस्तविहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्ति, प्रत्येक शरीर, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यश कीर्ति, निर्माण तथा तीर्थंकर 37 नाम कर्म की प्रकृतियाँ, शुभ गोत्र तथा साता वेदनीय ये 42 पुण्य प्रकृतियाँ हैं । अस्मात् पुण्यसंज्ञककर्मप्रकृति समूहादन्यत्कर्म पापकमित्युच्यते । तद्द्वयशीतिविधम् । तद्यथा ज्ञानावरणप्रकृतयः पञ्च दर्शनावरणस्य नव, मोहनीयस्य षडविंशतिः, पञ्चान्तरायस्य, नरकगतिः, तिर्यंग्गति: चतस्रो जातयः, पंच संस्थानानि, पंच संहननानि, अप्रशस्त
SR No.524767
Book TitleJain Vidya 20 21
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1999
Total Pages124
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size9 MB
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