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________________ 66 जैनविद्या - 19 5. लक्ष्मीचन्द्र जैन, आगमों में गणितीय सामग्री तथा उसका मूल्यांकन, तुलसी प्रज्ञा, जैन. वि.भा., खंड 6, अंक 9, 1980। 6. L.C. Jain, The Tao of Jaina Sciences, Delhi, 1992. 7. इस विषय में जापान के प्रोफेसर काजुओ कोंडो (योत्सुकायदो नगर) ने Post R.A.A.G. पत्रिका में अनेक गहन जटिल शोधमय लेख देकर एकसूत्री सिद्धान्त बनाने में अभूतपूर्व प्रयास किये हैं। 8. (37) Jain, L.C., On the Spiro-elliptie Motion of the Sun implicit in the Tiloyapannatti, I.J.H.S., Vol. 13, No. 1, 1978, pp. 42-49 ,साथ ही Lishk, S.S., Jaina Astronomy, Delhi, 1987. (ब) 18, त्रिलोकसार। 9. Lishk, S.S.; Sharma, S.D. - The Evolution of Measures in Jaina Astronomy, Tirthankara, Vol. 1, Nos, 7-12, July-Dec., 1975, 73-92. पुनः चीन में छाया माप द्वारा सूर्य की ऊँचाई 1,00,000 ली ज्ञात की गई। जबकि पृथ्वी की गोलाई का कोई अनुमान नहीं था। अतएव इसे 800 योजन जैन मान लेने पर योजन लगभग 97, मील आता है, जिससे पृथ्वी की परिधि लगभग 23,000 मील प्राप्त हो जाती है। इस तथ्य के द्वारा भौगोलिक समाग्री व तथ्यों को जिनागम के अनुसार व्यवस्थित करने सम्बन्धी शोध को बढ़ावा मिल सकता है। 10. इस संबंध में हमारे शोध-निर्देशन में एक रूसी छात्र क्रिवोव सिरगुई कार्य कर रहा है ___ जो लाडनूं की जैन विश्वभारती में Ph.D. के लिए रजिस्टर्ड रिसर्च स्कॉलर है। हमने जो लब्धिसार, प्रस्तार रत्नावली तथा करणानुयोग के समस्त ग्रन्थों का प्रोजेक्ट इंडियन नेशनल साइंस अकादमी दिल्ली से अंग्रेजी में न्यास पूर्ण एवं प्रणाली पूर्ण कार्य विगत 12 वर्षों में प्रस्तुत किया है वह कम्प्यूटर के प्रयोग हेतु प्रायः पर्याप्त है। अत: कम से कम जैन कम्प्यूटर्स इंजीनियर्स तथा System Theory में लगे हुए जैन प्रोफेसर समूह इस न्यास तथा प्रणाली की इस सिद्धान्त सामग्री से अभूतपूर्व लाभ, पूर्वो के अवशेष ज्ञान को उसमें पूर्णता लाते हुए समृद्ध कर सकते हैं तथा ऐतिहासिक विलुप्त पूर्वो की कर्मसिद्धान्तमय सामग्री को विश्वव्यापी अहिंसा के प्रभाव का प्रसार करने में ला सकते हैं। हमारा कार्य प्रायः 10,000 पृष्ठों में है और अब इस ओर विशेषकर उन्हें अपने धन को लगाना है जिनके इसे सुरक्षित-संरक्षित रखने का शताब्दियों की आचार्य परम्परा द्वारा भार सौंपा गया था। जैन समाज का उत्तरदायित्व तभी पूर्ण हो सकता है जबकि इसे मात्र कागजों, अलमारियों, वेष्टनों अथवा ताम्रपत्रों की वस्तु बनाकर ही न असहाय छोड़ दिया जाये वरन् इसे विभिन्न श्रेणियों में अध्ययन-अध्यापन की वस्तु भी बना दिया जाये। बिना आधुनिक प्रसंग में आये इस ज्ञान में कैसे रवानी लायी जा सकती है? इतिहास साक्षी है कि इस साहित्य में सदैव आधुनिक प्रसंग में ही अध्ययन-अध्यापन का विषय
SR No.524766
Book TitleJain Vidya 19
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1997
Total Pages78
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size6 MB
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