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________________ जैनविद्या - 19 67 बनाया जाता रहा किन्तु कुछ शताब्दियों से इसमें अकस्मात् ढील आ गयी। वह मात्र दर्शनीय, अनुवाद या किसी छोटे से प्रसंग को लेकर विवाद की वस्तु अथवा मात्र इतिहास की वस्तु बनकर रह गयी। यदि वह जीवन के कण-कण या प्रति-पल होने वाले भाव से सम्बन्धित विज्ञान है, गणितीय प्रमाणों को लिये हुए है तो क्या वह प्रयोगों के क्षेत्र में नहीं लाया जा सकता है? किसी भी सिद्धान्त को प्रयोगान्वित किया जा सकता है, क्योंकि अब सूक्ष्मतम तरंगमय या कणमय तथा उनके समूह और उनकी सामूहिक शक्तिमय प्रतिक्रियाओं को प्रतिफलन आदि को शुद्ध रूप में आनुपातिक या सादृश रूप में मापे जा सकते हैं । जब आइंस्टाइन के सापेक्षता सिद्धान्त के बीजीय समीकरणोंको संख्यात्मक रूप में प्रयोगान्वित किया जा सका तो, कर्मसिद्धान्त को भी प्रयोग में लाने हेतु हमें एक ऐसे ही प्रतिभावान प्रोफेसरों की टीम चाहिए होगी जिन्हें एक केन्द्र पर लाया जाकर इस सिद्धान्त को गणितीय विज्ञान की कसौटी पर कसने हेतु सुविधाएँ दी जायें। वस्तुतः यह आम जनता की वस्तु तो तभी बन सकेगी जबकि विद्वानों का यह दल प्रयोगों द्वारा पुष्ट करेगा कि कौनसी कर्मप्रकृति स्थितियों, अनुभागों और प्रदेशों के आब्यूहों को लिये हुए विभिन्न प्रकार की शंकाएँ समाधान कर सकेगी। गणित के बिना जो भी विवाद प्रस्तुत किये जाते हैं उनका परिणाम व्यर्थ-जाता है और कटुता का रूप लेता चला जाता है। बड़े-बड़े भवनों का निर्माण भी, यदि उनमें ऐसे सामयिक रूप ज्ञान को मात्र-प्रदर्शन के रूप में रख लेना भी निष्फल होने की दिशा में बढ़ना होता है। दीक्षा ज्वैलर्स, 554 सराफा, जबलपुर-2 गणित विभाग, मानस गंगोत्री, मैसूर विश्वविद्यालय, मैसूर-6
SR No.524766
Book TitleJain Vidya 19
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1997
Total Pages78
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size6 MB
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