________________
जैनविद्या - 19
65 इसमें सन्देह नहीं है कि इस कर्मसिद्धान्त को प्रयोग की वस्तु बनाने हेतु भागीरथ प्रयास जैन समाज को करने होंगे, क्योंकि एक तो इस जटितलम गणितीय सामग्री को आधुनिक वैज्ञानिक सामग्री के ज्ञान (बोध) के बिना न केवल गहराई से समझना सम्भव है वरन् उसे अध्यापन और शोध की वस्तु भी बनाना बड़ा कठिन कार्य है। प्राचीन और अर्वाचीन के बीच की कड़ी को कौन निर्मित कर सकेगा, ऐसी क्षमता न तो मात्र धनाढ्य में है न उसमें है जो इसमें रुचि ले सका हो। अत: मात्र प्रदर्शन या मात्र विवाद की वस्तु बनाकर हमने पूर्ण संतोष धारण कर लिया है कि यह हमारे पूर्वजों की विरासत में मिली निधि मात्र है जो हीरों या जवाहरातों की तरह शोभा की वस्तु या कोरे प्रयोगरहित अध्ययन की वस्तु मात्र है। प्रयोग के क्षेत्र में प्रमाणों सहित आकर ही चिर-सम्मत वस्तु सार्वभौमिक, सार्वकालिक, सार्वोपयोगी बन जाती है, संभवत: इसी प्रयोजन एवं अभिप्राय को लेकर हमारे आचार्यों ने इस निधि को हमें सौंपा था परन्तु समय पर, समय होते, धन होते हुए भी हम शताब्दियों तक इसे सुन्दरतम आवरण से ढंके रहे।
हो सकता है कि धवलादि ग्रन्थों को मुनिवर्ग के अध्ययन तक ही सीमित रखा गया हो, किन्तु श्री नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती ने समय की माँग को देखते हुए चामुण्डराय जैसे श्रावक के लिए 'गोम्मटसार' आदि की रचनाकर गंगा की एक नहर निर्मित करने में अपार शक्ति लगा दी थी और अब आधुनिक प्रसंग की मांग हेतु ऐसा कौन भाग्यशाली तपस्वी, योगी, संत शिरोमणि होगा जो इस कटी हुई नहर के बंद द्वार को खोलकर एक नई नहर बनाने में, इतिहास में स्वर्णाक्षरांकित होने में सफल होगा?
इस लेख में हमने गणितीय विवेचन को दूर ही रखा है ताकि वास्तविकता सहज फूल की तरह खिलकर चैत्य बोध दे सके कि विशुद्धि मात्र का गणित सम्यक्दर्शन उत्पन्न करने की ओर प्रेरणा की वस्तु बनने के स्तर तक प्रकट हो सके। यह भी देशना का एक भाग है जिसके आगे ही प्रायोग्य और करण लब्धियों से साक्षात्कार होता है, अन्यथा नहीं। सम्भवतः हम ऐसे प्रयास को सफल बनाकर भव्यों के लिए देशना का लाभ देकर अभूतपूर्व पुण्य एवं धर्म का लाभ देने में विवेकशील हो सकें।
1. प्रशियन अकादमी ऑफ साइंसेज, जनवरी 27, 1921. आइडियाज़ एक ओपिनियंस,
लंदन 1956. 2. गोम्मटसार, कर्मकाण्ड, गाथा 397 । 3. आंग्ल भाषा में इन ग्रन्थों के गणित का सविस्तार विवेचन क्रमशः तीन INSA प्रोजेक्स
में किया गया है, जो 1984-87, 1989-91, 1992-1996 अन्तराल में प्रस्तुत की गई
हैं। साथ ही देखिए, प्रोफेसर एल.सी.जैन, ताओ ऑफ जैन साइंसेज, दिल्ली, 1992. 4. अर्हत् वचन, (इंदौर) क्रमशः 4.1, 1992; 13-20; 4.4, 1992; 12-21; 5.3, 1993;
155-171, एवं महावीर जयन्ती स्मारिका (जयपुर), 1992/3/1-61